रविवार, 21 दिसंबर 2008

शुरुआत में अन्त बताया नहीं करते

ये झरने ,ये नदियाँ , चाँद तारे

ये बच्चे , ये बूढे , आदमी सारे

सब मेरे अपने हैं

तृप्ति है , फ़िर भी क्या पाने को बाकी है

तृप्ति है तो सपना नहीं है

सपने के बिना चला नहीं जाता

कतरे हुए पँखों से उड़ा नहीं जाता

नागफनी के बीज हलक से उतारा नहीं करते

जहन में मरुस्थल कैसे लायें

शुरुआत में अन्त बताया नहीं करते

दोनों तरफ़ खेल का मज़ा बना रहने दो

घुँघरू खनकाए वो , और हम थिरकें

4 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सुंदर सोच, अच्छा प्रयास है आपकी कविता

संगीता पुरी ने कहा…

शुरुआत में अन्त बताया नहीं करते


दोनों तरफ़ खेल का मज़ा बना रहने दो


घुँघरू खनकाए वो , और हम थिरकें

अच्‍छी सोंच....बहुत सुंदर।

शोभा ने कहा…

अच्छा लिखा है।

रंजना ने कहा…

Kripaya is rachna me bhavon ko tanik aur vistaar den to sundarta aur nikhar uthegi.

sundar abhivyakti.