बुधवार, ४ नवम्बर २००९

सोने दे मुझे शब भर को

सोने दे मुझे शब भर को
कितनी है कीमत अपनों की
आराम की कीमत कितनी है
आँसू न कर पाये कीमत
उधड़ा है जिगर
सिलाई की कीमत कितनी है
सब्र कितने वक्त का , ये बता
ये सफर है या मुकाम
आड़े वक्त के साथी ,
क्या यही है मेरा ईनाम
सोने दे मुझे शब भर को

शुक्रवार, १६ अक्तूबर २००९

दीपमलिके



दीपमलिके , हम तेरे इन्तजार में
घर सजा के बैठे रहे
मन भी है सजता यूँ ही
इस बात से अछूते रहे
होती है दीवाली किसी की
उपहारों से भरी
हो जाते हैं उनमे ही गुम
और किसी की यूँ दिवाली
तेल है रुई बाती
हो जाए बत्ती ही गुल
स्वागत हैं करते जलते दियों का
है नहीं मोल जलते प्राणों का कोई
घर में हैं करते ढेरों प्रकाश
प्रार्थना करते हैं , बसें
स्थाई हमारे घर में श्री लक्ष्मी गणेश
मन नहीं करते हैं स्वच्छ
करें अंतरात्मा में प्रकाश
टिम टिम कर जलते दिये
छू लें जो मन का कोना
हजारों दियों सी हो रोशनी
कई पूनम सी हो जाए
अमावस की काली रात
मन भी है सजता यूँ ही
इस बात से अछूते रहे

शनिवार, १० अक्तूबर २००९

अपना अपना जोग भया


दुख दारु सुख रोग भया
दारु दारु उन्माद हुआ
दुख न हुआ प्रमाद हुआ
गीतों में ढल कर शाद हुआ
किर्चों से मिल कर नाद हुआ
खुशबू में बँट आबाद हुआ
दुख दारु सुख रोग भया
अपना अपना जोग भया

शनिवार, ३ अक्तूबर २००९

टिम-टिम करती मेरी आशा का


जुगनू की तरह मेरी आशा
बुन लेती है सन्सार पिया
मेरी आँखों में पाओगे
तुम अपना ही तो सार पिया
दिल में मैं छुपा के रख लेती
ये जग काँटों का हार पिया
अट जाये फूलों से रास्ता
ऐसा हो तेरा घर-द्वार पिया
छल किया है किस्मत ने मुझसे
कैसे कह दूँ इसे दुलार पिया
हर बार ये कहती जरा धूप है
ऐसा हुआ न पहली बार पिया
दुख पकड़ा नहीं , सुख ढूँढा किए
अपने हाथों में है सितार पिया
टिम-टिम करती मेरी आशा का
ये ही तो है विस्तार पिया



बुधवार, २ सितम्बर २००९

निष्ठुर छल गया जीवन

एक मित्र के पिता के दुनिया से चले जाने के बाद , मित्र की माँ जब जब मुझे मिलीं रोईं जरुर , जैसे अतीत के गले लग आईं हों | क्या हमने कभी बुढापे की आँख से जिन्दगी को देखा है ?


जीवन के उत्तरार्ध को
जाता हुआ जीवन
साथी भी साथ छोड़ गए
निष्ठुर छल गया जीवन

काँपते हाथ और जज्बात
लाचार नहीं , आधार नहीं
मेरे हाथों में सँसार नहीं
यूँ गल गया जीवन

बोझ यादों का भी है
सीने में सुलगता दावानल
सैलाब है बहता आँखों से
है हिल गया जीवन

वो कौन सी चीज है
जो चलाती है जीवन को
डोर टूटी तो पतझड़ आ गया
निष्ठुर ढल गया जीवन

बुधवार, २६ अगस्त २००९

कैसे खो दूँ मैं तुझे


एक बड़ी ही प्यारी मित्र ने कुछ ऐसा किया जो हमारे रिश्तों में कडुवाहट घोलने के लिए काफी था | ऐसे वक़्त में कुछ इन पंक्तियों से ख़ुद को समझाया |


आँसू आ के रुक गया
आँख की कोरों पर
कैसे नाराज हो जाऊँ
मैं तुझ से गैरों की तरह
दुःख तो होता है
तेरी बेरुखी पर
कैसे खो दूँ मैं तुझे
भीड़ में लोगों की तरह
फूल भी अपनों के मारे हुए
लगते हैं शूलों की तरह
कैसे खो दूँ मैं तुझे
राह में भूलों की तरह
तेरी यादें मुझे यूँ भी
उम्र भर सतायेंगी
कैसे खो दूँ मैं तुझे
गुजरी हुई बातों की तरह

बुधवार, १९ अगस्त २००९

लगती है एक उम्र


इतने कड़वे सचों का सामना करना आसान नहीं है , वास्तविक जिन्दगी में पत्नी के सच बोलने पर नोएडा का एक पति पँखे से लटक गया और एक ने पत्नी के गले पर ब्लेड मार मार कर मारने की कोशिश की | ऐसे सच को बर्दाश्त करना इसीलिये मुश्किल हो गया है क्योंकि इन्सान अपने किए गुनाह को भी गुनाह नहीं समझता और दूसरों से हुई गल्ती को भी गुनाह का दर्जा देता है | किसी तरह भी माफ़ नहीं करता | ऐसे सच बोल कर क्या इनाम पाया ?


दिलों को न तू तोड़ना
बोल देना झूठ भी
है एक अदालत और भी
श्वासों की कद्र कर
लगती है एक उम्र , आशिआना बनाने में
कैसे कर देगा अपने ही हाथों , तिनका तिनका बिखराने में
सच बोलना है ख़ुद से बोल
न मोल भाव कर
कुछ ऐसे सच हैं अगर
सीख ले , भूल जा वो बेडियाँ
हिल जायेंगी तेरी ईंटें
आँधियों में सँभाल कर
शाश्वत है सत्य जीवन
जिन्दा हैं इनकी रूहें
बोलना तू मीठे बोल से
निवालों को तौल कर
दिलों को न लताड़ना
जीवन की कद्र कर


{' कैसे करें सच का सामना ' भी इसी मुद्दे पर लिखी गई कविता है (इसी ब्लॉग पर )}