रविवार, 15 सितंबर 2019

मॉं का दिल

हाथों से फिसलती हुई दुनिया थी
और क़दमों में दम था ही नहीं
अपने ही जिगर के टुकड़ों को ,
जब देखते हैं हम मुश्किल में
तारे टूटें , धरती धँसती , आँखों में समँदर ठहरा सा
और कहर की रात है क्या

उठती-गिरती साँसें थीं
और ज़िन्दगी रुठी थी
एक न्यामत होती है ज़िन्दगी
टँग जाएँ हम उल्टे भी
इस दुनिया की खातिर ही , तो भी गम ही नहीं
जिसके सहारे निश्चिन्त थे हम
वो ही धरती डोल गई
और कहर की रात है क्या

सूरज हो तुम ,चँदा हो तुम
मेरी आँखों के तारे हो तुम
मेरी रातों के उजियारे हो तुम
कलाई पर दूर बैठी बहनों के नाम की पहनी हुई राखियों को ,
देवी माँ के बँधे हुए रक्षा कलावे को उतरवा कर
ओढ़ कर माँ पापा की दुआओं का आसमान ,
प्रेयसि की धड़कनों का ताज,
इष्ट-मित्रों  ,अज़ीज़ों की दुआओं के साथ
जा रहे थे तुम ओ.टी. की तरफ 
कड़वी दवाई पिलाई है ज़िन्दगी ने घूँट-घूँट कर के 
रुलाइयाँ अटक गईं हैं हलक में 
तेरी सलामती के लिए मैं दुनिया की सारी न्यामतें वार दूँ 
उठो संभालो मेरी दुनिया तुमसे 
जब-जब तू मुस्कराये , मेरी दुनिया खिल-खिल जाये 
लम्हा-लम्हा गाये , तू ज़िन्दगी को गले लगाये 
मेरे लिये इस से बढ़ कर और सहर की बात है क्या 

रविवार, 21 जुलाई 2019

जीवन की वेदी पे सब कुछ हवन है

साथ-साथ वक्त बिताना, मिलना-मिलाना अच्छा लगता है 
दुनिया के रँगों में रँग-रँग जाना अच्छा लगता है 

धीरे से जानोगे , धीरे से समझोगे 
बिना मक्सद के कोई किसी से नहीं है मिलता 
धीरे-धीरे खुलेगी कलई रिश्तों की , दोस्तों की 
गरज हो तो सिर पे बिठायेगी दुनिया 
ज़र्रे-ज़र्रे में जमीं पे गिराना ,
दुनिया को अच्छा लगता है 

मन ही है मिट्ठू , मन ही है बौना 
मन ही है ख्वाहिशों की चादर , अपना बिछौना 
मन ही है मिट्टी , मन ही है सोना 
इक अंधी दौड़ का राही है ये 
कैसे बतायें खोना न खोना 
इक नँगा सच है जिस्म लपेटे 
मन ही है अद्धा-पव्वा , मन ही है सागर सलोना 
मन के रँगों में रँग-रँग जाना अच्छा लगता है 

मन को सँभालो , दुनिया है मुट्ठी में 
कोई देखे न देखे , जाने न जाने 
तेरा सब्र ही है तेरी मस्ती 
दुनिया की भीड़ से अलग तेरी बस्ती 
आया कोई तो गले से लगा लो 
न आया तो रंज नहीं है 
राहों से अपना कोई गिला न 
जीवन की वेदी पे सब कुछ हवन है 
जीवन ही मुस्कराये , चमन में खुशबू-खुशबू होना ,
अच्छा लगता है 

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

डॉक्टर

होता है दूसरा खुदा तो डॉक्टर भी 
जो बदल देता है बद से बदतर होते हुए हालात को भी 
लिखता है खुशियाँ , गम की रात में होता है उजाले की किरण सा 
पोंछता है आँसू , बाँटता है मुस्कानें 
लिखता है तकदीर इक बार फिर से 

आदमी जी रहा है जो साँसों का कर्ज़ है 
चोट-चपेट है या फिर कोई मर्ज़ है 
कौन समझेगा सीने में जो कोई दर्द है 
हाँ वो मसीहा है जो करता है वो सब ,
जो आदमी के हक़ में है 

हाँ वो दूसरा खुदा है 
जो लिखता है तकदीरें इक बार फिर से 
अपनी तदबीरों से 


बुधवार, 26 जून 2019

जुदाई

दिन-दिन कर के बीत गये
पल-लम्हें सब रीत गये
एक ही सिक्के के दो पहलू
मिलन जुदाई रीत भये

जा पहुँची है दुनिया चाँद पे
चलती दुनिया के सब साथी
देख ले मनुवा तू है कहाँ
सीख ले कुछ अन्दाज़ नये

दिल के टुकड़े,सुहानी यादें
पीछे छूटे, हजारों मील
नम आँखें और नम सीने हैं
कसक हमेशा प्रीत भये

आ पहुँची जाने की सुबह भी
दिल को है फिर समझाया
जो छूटा है वो अगली बार
ख्यालों के जुगनू चमकते हैं
उम्मीदों के दिये रौशन हैं किये

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

झूल आयें सुकून की बाहें

हजारों मील का सफर ,
और बाहें फैलाए हुए दिल
कुछ रिश्ते तो हों ऐसे भी ,
के झूल आयें सुकून की बाहें

हमारी राहों में चांद उग आता ,
न दिन का पता होता न रात का
नींद से बोझिल आँखों में भी ,
सितारों सी टिमटिमाहट होती

आओ के मिलन के रंग में रंगे ,
और फिर जुदाई की खुराकें पी लें
नहीं नहीं, तरक्की की सीढ़ियां चढ़ कर ,
पतंगों सा लहरा कर उड़ लें

तुम आते हो सैंटा की तरह ,
उपहारों से लदे हर सीजन
हर चेहरे को मुस्कराहट देने ,
और वक्त को थोड़ी चाभी भरने

रविवार, 27 जनवरी 2019

अन्दर से हम वही होते हैं

हम घूम आयें चाहे जितना भी देश-विदेश 
दुबई,मॉरीशस,यूरोप हो या हो कोई भी देश 
अन्दर से हम वही होते हैं 
अपनी जड़ों से जुड़े 
अपने बचपन की अमानत 
ओढ़ लें चाहे हम कोई भी भेष 
नहीं भूलता है माँ की उँगलियों का स्वाद 
मिट्टी में रची-बसी सी वो खाने की महक 
लड़कपन के वो दोस्त , गुपचुप बातें करते 
अल्हड़ सी जवानी के वो अद्भुत से खिँचाव 
नहीं भूलते हैं वो लम्हे , जो पढ़ा जाते हैं जीवन की किताब 

वो खेत ,नदी या छत की मुँडेरों पर चुपचाप बिताये हुए लम्हे 
वो मान-मन्नौव्वल करती हुईं चुहलबाजियाँ 
अन्दर तक उतर जाती हुईं नाराजगियाँ 
लगाम लगाती हुईं बन्दिशों का जहर 
कैसे बयाँ हो पाएं वो सब , इक-इक ईंट चिनता है आदमी 
तब कहीं मीनार खड़ी होती है 

बेशक परवरिश ही बनाती बिगाड़ती है हमें 
जूनून ही सँवारता है हमें 
लहराते रहते हैं हम आसमाँ में 
मगर डोर है उसी जमीं के हाथ 
पतँग की तरह कटते ही हो जाते हैं जमींदोज 
मगर अन्दर से हम वही होते हैं

आस की डोरी थामे,
नन्हे ज़िद्दी बच्चे से , रंग बिरंगी पतंगों से भरे आसमां को तकते हुए 

बुधवार, 12 सितंबर 2018

जब न होंगीं राहें हक़ में

कैसे चलोगे जब न होंगीं राहें हक़ में 
जब भी कोई गुजर रहा होता है जिस्मानी तकलीफों से 
वो सिर्फ जिस्मानी दर्दों से ही नहीं गुजरता है ,
वो गुजर रहा होता है,रूह तक उतरती हुई दुनिया की बेरुखी , नजर-अन्दाज़ी , हिकारत और नसीहतों के दर्द से भी 
कुछ बड़े करीबी भी खड़े हो जाते हैं दुनिया की भीड़ में ही 
कितना ही उतरने न दो दँशों को सीने में,
मगर क्या कोई मसीहा हुआ है ?

खरीदी हुई सेवाएँ भी कितनी सगी हुई हैं 
मतलब निकलते ही पल्ला झाड़ कर हर कोई अलग खड़ा हुआ है 
आड़ा वक़्त ही तपाता है बेशक ,
नम सीने की फूटती रुलाइयों में भला क्या कोई सख्त हुआ है 
सुनते हैं कि मिटती नहीं है खुशबू फूलों की ,
मगर मसले जाने तलक भला क्या जीना हुआ है 
 हर आँख खाली है , हर बात है बेमायने 
नाख़ुदाओं के शहर में , अपने-अपने हिस्से की धूप-छाया में हर कोई भरमाया हुआ है