मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

झूल आयें सुकून की बाहें

हजारों मील का सफर ,
और बाहें फैलाए हुए दिल
कुछ रिश्ते तो हों ऐसे भी ,
के झूल आयें सुकून की बाहें

हमारी राहों में चांद उग आता ,
न दिन का पता होता न रात का
नींद से बोझिल आँखों में भी ,
सितारों सी टिमटिमाहट होती

आओ के मिलन के रंग में रंगे ,
और फिर जुदाई की खुराकें पी लें
नहीं नहीं, तरक्की की सीढ़ियां चढ़ कर ,
पतंगों सा लहरा कर उड़ लें

तुम आते हो सैंटा की तरह ,
उपहारों से लदे हर सीजन
हर चेहरे को मुस्कराहट देने ,
और वक्त को थोड़ी चाभी भरने

रविवार, 27 जनवरी 2019

अन्दर से हम वही होते हैं

हम घूम आयें चाहे जितना भी देश-विदेश 
दुबई,मॉरीशस,यूरोप हो या हो कोई भी देश 
अन्दर से हम वही होते हैं 
अपनी जड़ों से जुड़े 
अपने बचपन की अमानत 
ओढ़ लें चाहे हम कोई भी भेष 
नहीं भूलता है माँ की उँगलियों का स्वाद 
मिट्टी में रची-बसी सी वो खाने की महक 
लड़कपन के वो दोस्त , गुपचुप बातें करते 
अल्हड़ सी जवानी के वो अद्भुत से खिँचाव 
नहीं भूलते हैं वो लम्हे , जो पढ़ा जाते हैं जीवन की किताब 

वो खेत ,नदी या छत की मुँडेरों पर चुपचाप बिताये हुए लम्हे 
वो मान-मन्नौव्वल करती हुईं चुहलबाजियाँ 
अन्दर तक उतर जाती हुईं नाराजगियाँ 
लगाम लगाती हुईं बन्दिशों का जहर 
कैसे बयाँ हो पाएं वो सब , इक-इक ईंट चिनता है आदमी 
तब कहीं मीनार खड़ी होती है 

बेशक परवरिश ही बनाती बिगाड़ती है हमें 
जूनून ही सँवारता है हमें 
लहराते रहते हैं हम आसमाँ में 
मगर डोर है उसी जमीं के हाथ 
पतँग की तरह कटते ही हो जाते हैं जमींदोज 
मगर अन्दर से हम वही होते हैं

आस की डोरी थामे,
नन्हे ज़िद्दी बच्चे से , रंग बिरंगी पतंगों से भरे आसमां को तकते हुए 

बुधवार, 12 सितंबर 2018

जब न होंगीं राहें हक़ में

कैसे चलोगे जब न होंगीं राहें हक़ में 
जब भी कोई गुजर रहा होता है जिस्मानी तकलीफों से 
वो सिर्फ जिस्मानी दर्दों से ही नहीं गुजरता है ,
वो गुजर रहा होता है,रूह तक उतरती हुई दुनिया की बेरुखी , नजर-अन्दाज़ी , हिकारत और नसीहतों के दर्द से भी 
कुछ बड़े करीबी भी खड़े हो जाते हैं दुनिया की भीड़ में ही 
कितना ही उतरने न दो दँशों को सीने में,
मगर क्या कोई मसीहा हुआ है ?

खरीदी हुई सेवाएँ भी कितनी सगी हुई हैं 
मतलब निकलते ही पल्ला झाड़ कर हर कोई अलग खड़ा हुआ है 
आड़ा वक़्त ही तपाता है बेशक ,
नम सीने की फूटती रुलाइयों में भला क्या कोई सख्त हुआ है 
सुनते हैं कि मिटती नहीं है खुशबू फूलों की ,
मगर मसले जाने तलक भला क्या जीना हुआ है 
 हर आँख खाली है , हर बात है बेमायने 
नाख़ुदाओं के शहर में , अपने-अपने हिस्से की धूप-छाया में हर कोई भरमाया हुआ है

शनिवार, 4 अगस्त 2018

फ्रैंकफर्ट से आने के बाद

दिन उड़ गये पँछियों की तरह , खबर न रही 
वक़्त की फितरत है , फिसल जाता है हाथों से ,उम्र की ही तरह 

अब ये आलम है कि कुछ छूट गया सा लगता है 
लम्हा-दर-लम्हा पकड़ पाना भी मुमकिन न था 

तुम्हारे घर की बाल्कनी से ,दूर उड़ते हुए प्लेन देख कर 
ये ख्याल तो आता था कई बार कि किसी दिन 
ऐसे ही प्लेन से वापिसी होगी 
जाना तो आने के साथ ही तय था 
मगर अहसास उल्टी गिनती का 
आया आधे दिन गुजर जाने के बाद 

पराया मुल्क भी बड़ा अपना सा लगता है 
जिसमे बस गये हों अपने , धड़कनों की तरह 
हम लौट आये हैं ,कुछ छोड़ आये हैं 
कुछ ले आये हैं साथ , वो अहसास 
खिली धूप सा कहता है कानों में कोई 
हालो , डाँके शोन , चुइस...... 
और तुम्हारे शहर का मौसम आँखों में उतर आता है 


हालो - हलो ( अभिवादन )
डाँके शोन - धन्यवाद सुन्दर
चुइस - बाय  (विदा )
जर्मन में

मंगलवार, 29 मई 2018

केदारनाथ में एक रात

सहलाओ मेरे ज़ख्म भोले ताकि मैं सो जाऊँ 
शिव के प्राँगण में , नींद क्यूँ रूठी है 
लाशों के ढेर जहाँ कभी गाजर-मूली से बिछ गये हों 
दफन हुए अपने जहाँ ,साथ-साथ सपनों के 
आज वहाँ हमने बिस्तर लगाया है 
मेरे जख्म कुछ भी नहीं , मेरा दर्द छोटा है 
तेरे लिए सारी दुनिया है बराबर , बम-बम भोले 

आस्था की नगरी में गूंजे बम-बम भोले 
प्राणों की आहुति से धरती डोले 
सवाल सदियों के हैं , जवाब एक ही है 
अपना-अपना कर्म ही अपनी अपनी विधि हो ले 
शव को शिव करने की ताकत है जहाँ 
आस्था का सैलाब है वहाँ 
मेरी हस्ती कुछ भी नहीं 
मेरी नींद की बिसात ही क्या 
मेरी साँसें भी सार्थक हों , 
जो तेरे काम आ जाएँ , बम-बम भोले     

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

आँखों में सितारे भर


चिया चली गई ससुराल
आँखों में सितारे भर ,
लहँगा पहन ,चुनरी ओढ़ ,
डाल कर उसके हाथों में हाथ
सोचा भी बहुत था ,
लिखा भी था
बोला मगर कुछ भी न गया
न तो गाये विदाई के गीत
न ही सुनाये स्वागत के बोल ,जो मुस्कराये मनमीत
रुँधे गले से जो भी सुनाती
उतर आता सावन तेरी अँखियों में
और तेरी तकलीफ मुझे गवारा न होती

उसी दिन विदा हो जाते हैं बच्चे घर से ,
जिस दिन पढ़ाई या जॉब के लिए घर छोड़ जाते हैं
मगर ये बदलाव तो बहुत बड़ा है
अब न वो बचपन का घर होगा
नई नई सी फिजा होगी
अब बदल गया है तुम्हारा पता

छुट्टियों में तुम्हारी मन्जिल होगी पिया का घर
इक पल उदास होती हूँ
तो दूसरे ही पल मुस्कराने लगती हूँ
इस दिन के लिए तो तैयार रहना था मुझको
अपने घर में तू चहकती मिले
कलीरों के लश्कारों सा तेरा जहाँ चमके

माँ के अँगना की छाँव तो हमेशा से तुम्हारी है
घर-द्वार हमेशा स्वागत में रहेंगे
ये पल , ये लम्हें यादों में बस जायेंगे
सीने में तुम अक्सर यूँ ही मुस्कराओगी
चूड़ा पहने ,कलीरे छनकाती ,ज़िन्दगी की नई शुरुवाद करतीं

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

सवाल आरुषि की माँ से

 जैसे है हक़ तुम्हें जीने का 
वैसे ही हक़ था उस नन्हीं जान को भी दुनिया में रहने का 
हाँ तुम्हारी आँखों में नहीं है तड़प 
ये जान लेने की कि किसने काटा गला तुम्हारी बेटी आरुषि का  
अब लिख रही हो कविता 
तुम्हारी कविता भी वो सवाल नहीं उठाती 
मन फरेबी है , कब मछली सा पलट के समन्दर का पानी पी लेता है 

मदद करनी थी तफ्तीश में 
मिटा डाले क्यूँ सारे साक्ष्य ?
कानून की आँख पर तो पट्टी बँधी है 
ज़मीर भी क्यों सोने चला गया है 
न दिन चढ़ता है ,न तारीख बदलती है,ठहर जाता है वक़्त 
ये ऐसा वाक़या हजार सवाल करता है 
तुम्हारी आँखों में वो सवाल क्यूँ नहीं उठता ?
जलजला आना चाहिये था 
क्या राज दफ़न है तुम्हारे सीने में 
तुम्हारी ममता कभी तो सवाल पूछेगी 
चीख-चीख कर आसमान सर पे उठा लेगी 
हाँ बताओ वो बात भी दुनिया को 
जो सबक हो कि फिर आगे कोई उस राह न चले 
न चढ़े बलि इस तरह कोई भी ज़िन्दगी 
न मुरझाये कोई कली इस तरह असमय , अकारण ,अकस्मात