बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

दो चिडियाँ चूँ-चूँ करती हैं


















दो चिडियाँ चूँ-चूँ करती हैं
दो नन्हीं परियाँ सँग-सँग चलतीं हैं
मेरे बाग़ में , हंसती हैं और मचलती हैं
दो चिडियाँ चूँ-चूँ करती हैं

झट से यूँ मुस्का देती हैं
रंग सारे बिखरा देती हैं
मेरा आँगन सदा जोहता
बाट उनकी निहारे

बचपन बीता आई जवानी
सज गई फूलों की डाली
मेरे आँगन की खुशबू है
मेरा मन पुकारे


होली बीती आई दीवाली
रँग सारे रोशनी सा सज गए
तन मन रँग गए खुशी के रँग में
चिडियाँ , घोंसला सारे

5 टिप्‍पणियां:

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

दो नन्हीं परियाँ सँग-सँग चलतीं हैं

मेरे बाग़ में , हंसती हैं और मचलती हैं

दो चिडियाँ चूँ-चूँ करती हैं

मेरे आँगन में भी दो परियां यूँ ही हंसती है :) सुंदर लगी यह रचना ..

mehek ने कहा…

bahut sundar

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर लगी .....

rajeev ने कहा…

aapki rachna bahut hi sundar aur lajabab hai aur aap hamesa esi rachnaye karti rahe.....

rajeev ने कहा…

aapki rachna bahut hi sundar hai aur aap esi acchi-acchi rachnaye hamesa karte rahe ....