बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

लहलहा सकता है दिल का कोना


दिल की नाजुकताई देखिये
पकड़ लेता है सब अनकहा
छू लेता है सब अनछुआ
उसी रास्ते पर खड़ा हो जाता है
जिस पर चलने का दम नहीं

बेबस , बेकल अकेली सी राहें
अंधियारे की कँटीली सी बाहें
धूप इकट्ठी करनी क्या जरूरी थी !
जब मौसम तपता रहा
दिल हथेली में लिए बैठे रहे

उसको कब दिखता रहा !
तूने देखा वही जो न देखना चाहा
तूने पकड़ा वही जो न पकड़ना चाहा
बो सकता था फूल
चुन सकता था उजली किरणें

कैसा भी हो मौसम का मिजाज
कोई एक पल , कोई एक ठहराव
बन सकता है मील का पत्थर
जीने का लगाव
लहलहा सकता है दिल का कोना
जो है अनछुआ , अनकहा

4 टिप्‍पणियां:

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

दिल की उलझन को बहुत खूबसूरत शब्दों में बांधा है आपने..

दिल और दिमाग में यही तो फ़र्क है.. दिल वही देखता है पकडता है जो वो चाहता है... दिमाग अच्छा बुरा सोच कर कदम रखता है..

लाजिम यही कि दिल के पास रहे पासवाने अक्ल
लेकिन कभी कभी इसे (दिल को) अकेला भी छोड दे

शोभा ने कहा…

कोई एक पल , कोई एक ठहराव



बन सकता है मील का पत्थर



जीने का लगाव



लहलहा सकता है दिल का कोना



जो है अनछुआ , अनकहा
बहुत सुन्दर लिखा है।

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर.....

रंजना ने कहा…

वाह !!बहुत बहुत सुंदर.मर्मस्पर्शी पंक्तियों ने मन को गहरे छू लिया. सार्थक रचना हेतु आभार..