शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

बेशकीमती बना


जितनी नश्वर है ये , उतनी ही कीमती है


चीजों की मिआद होती है , जिन्दगी की मिआद भी नहीं होती


जिन्दगी की उम्र होती है , और नहीं भी होती


जितना पकड़ते हो , हाथों से छूटी जाती है


छूट जाती है , टूट जाती है , रूठ जाती है


मन के अहसास कहीं मिटते हैं


ये दिन रात साथ चलते हैं


रुका पानी गन्दला हो जाता है


वक़्त के साथ-साथ बहना होगा


जिन्दगी छूटे , टूटे या रूठे , तुझको चलना होगा


आलों में सजी क्रॉकरी , सिर्फ़ आँख सेंकने के काम आती है


रँगों भरे प्याले हैं हम , जिनसे दुनिया का कारोबार चले


मरने के बाद जिन्दा रहें , कीमत तो कर , बेशकीमती बना

4 टिप्‍पणियां:

विनय ने कहा…
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विनय ने कहा…

बहुत ख़ूब, शारदा जी, बधाई

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव हैं। सुन्दर रचना है।बधाइ।

Pratap ने कहा…

जिन्दगी छूटे , टूटे या रूठे , तुझको चलना होगा
आलों में सजी क्रॉकरी , सिर्फ़ आँख सेंकने के काम आती है
रँगों भरे प्याले हैं हम , जिनसे दुनिया का कारोबार चले
मरने के बाद जिन्दा रहें , कीमत तो कर , बेशकीमती बना
हर पंक्ति अपने में स्वयं एक कविता है ...बहुत सुंदर.