सोमवार, 15 दिसंबर 2008

खुदा

कोई पढ़ ले , चुरा ले या जिन्दगी में उतार ले
इसी में सार्थकता है लेखन की

खुदा

मेरे पिता का दिल है सबसे बड़ा

ख्याल है उसको सदा , जब जब कोई अकेला पड़ा
पुकारों में वो जगमगा गया , लगा वो आया खड़ा

मेरे पिता का परिवार है सबसे बड़ा

किससे है शिकवा और क्यों गिला , गहरा कहीं रिश्ता बड़ा
संस्कार उसके सुखद हैं , रास्ता है ये लंबा बड़ा

मेरे पिता का दिल है कितना बड़ा

उसने ये महंगा सा सौदा कर लिया , हमको तो ये सस्ता पड़ा
तू खुशी से ख्वाब कर , हर मोड़ पर वो होगा खड़ा

मेरे पिता का घर है सबसे बड़ा

नदियाँ ,चाँद-तारे , दुनिया की न्यामतें सजा
भूला है तू चलन , पेंचों में जिन्दगी लड़ा

मेरे पिता का हुक्म है सबसे बड़ा

उसका हुक्म सिर माथे पर , उंगली पकड़ चलाएगा
रास्ता वही बताएगा , कदम जिस ओर तू चाहे बढ़ा

मेरे पिता का दिल है सबसे बड़ा

1 टिप्पणी:

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

बहुत अच्छा िलखा है आपने ।ं-

http://www.ashokvichar.blogspot.com