बुधवार, 17 दिसंबर 2008

कटु यादों की गठरी को ढोया नहीं करते

कटु यादों की गठरी को ढोया नहीं करते
दब जातें हैं बोझ तले
जख्मी हो जाते हैं पाँव , चला नहीं जाता
चकाचक आईना हो जा
जो है सामने है , जो है यही है
इतरा ले इसी पर
आईने गठरियाँ ढोया नहीं करते
आईने सपने भी सँजोया नहीं करते
थ्री () डायमेंशनल होना होगा
मैं , मेरे वाले से अलग
पहुँच के अन्दर , तस्वीर का हर आयाम दिखाना होगा
किसके अस्तित्व को क्या जरुरी है , तू खूब जानता है
किसी के अह की संतुष्टि की खातिर तू बदलेगा नियम
आईने की फितरत है वो हूबहू दिखाता है
मजबूरी , बेचारगी का रोना रोया नहीं करते
कटु यादों की गठरी को ढोया नहीं करते



2 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत अच्‍छा है।

रंजना ने कहा…

सत्य और सुंदर बात सुन्दरता से कही आपने.