मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

वहाँ जाया नहीं करते


जहाँ वक़्त बोझिल हो , कटता न हो
सुनाई देती हो घड़ी की टिकटिक
वहाँ जाया नहीं करते

जहाँ अपनत्व की उमंग न हो
घर खुला हो ,
दिल की खिड़की न खुली हो
वहाँ जाया नहीं करते

कदम भारी हों ,
पड़ाव हो रास्ते में फ़िर भी
दरवाजा खटखटाया नहीं करते

न कोई धन दौलत ,न कोई भेद पाना है
जिसे तकती हैं मेरी निगाहें ,उससे तू खाली है
बुला लेना तुझे जब भी , मेरी जरुरत हो
वक़्त की कीमत जाननी होगी
यूँ वक़्त को ज़ाया नहीं करते

2 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना है....बधाई।

अल्पना वर्मा ने कहा…

'जहाँ वक़्त बोझिल हो , कटता न हो
सुनाई देती हो घड़ी की टिकटिक
वहाँ जाया नहीं करते'
kavita saral aur sundar hai -bhav abhivyakti mein saksham hui..badhayee