गुरुवार, 13 नवंबर 2008

कुछ शेर

कटी शाखों के निशानों को , रोज रोज देखा नहीं जाता
टपकने लगता है लहू , जख्मों को कुरेदा नहीं जाता

मेरे महबूब के हाथों में कोई खंजर तो नहीं
उसके जख्मों से भी रिसता है लहू , कोई पानी तो नहीं 

ैसी हलचल है मेरे घर में , वीरानी तो नहीं 
कैसे जानूं जिन्दगी , मैं तेरी दीवानी तो नहीं

वही दुनिया है , खूबसूरती का सामान नज़र आती है
वही दुनिया है कि मौत का आगोश नज़र आती है

कैसे पकडूँ कि हर चीज़ फ़ना होती है
अपने अन्दर ही खामोशी की जुबान होती है

अपनी दुनिया में खुशी मेहमान बन के आती है 
उनींदी आंखों में कोई ख्वाब बन के आती है

घूँट घूँट पी लो तो जिन्दगी नशा होती है
छूटे जो हाथ से ,टुकडों टुकडों में बंटी होती है

या खुदा , ये कैसी बेकसी है के 
मन के हालात ही नजारों में नज़र आते हैं

1 टिप्पणी:

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा ने कहा…

उनींदी आंखों में कोई ख्वाब बन के आती है
घूँट घूँट पी लो तो जिन्दगी नशा होती है
छूटे जो हाथ से ,टुकडों टुकडों में बंटी होती है
मन के हालात ही नजारों में नज़र आते हैं,
bahut badhiya . likhati rahiye. dhanyawad.