रविवार, 23 नवंबर 2008

पकड़ना ही है तो कर्म को पकडो


आलस है तो , तुमको पकड़ लेता है ये
पकड़ लेते हो तो जकड़ लेता है ये
और जकड़ा तो नकारा कर देता है ये
पकड़ना ही है तो कर्म को पकडो
जकड़ना ही है तो मेहनत को जकडो
गढ़ना ही है तो वक़्त को गढो

एक एक मोती ,एक एक उतार चढाव
गहने की गठन , गहने की तपिश
लरजती उँगलियों के पड़ाव
आत्मा को अभिभूत करता बहाव
पकड़ना ही है तो कर्म को पकडो

ना बन पाए गर किसी गले का हार
किसी माथे का मुकुट , किसी पायल की झंकार
क्या हुआ , इस सफर में बने
बहुतों की खिली मुस्कान ,गर्माहट , रंगों की झनक , राहत का सामान
पकड़ना ही है तो कर्म को पकडो

1 टिप्पणी:

संगीता पुरी ने कहा…

पकडना है तो कर्म को पकडो
क्‍या खूब बात की है।
बहुत अच्‍छा।