गुरुवार, 13 नवंबर 2008

संभालें हम मन की डोरें

आओ कह डालें , सारी कथा
जीवन की सारी व्यथा

मन का प्याला हुआ क्यों खाली
टोली क्यों दुःख दर्दों की छा ली

क्यों चाबे ये चना चबैना
मन का इक मोर मुरैना

पकडें हम मन के धागे
क्यों हम जीवन से भागे

आओ कुछ उजली किरणें बाटें
बढती जायें ये जितनी काटें

सच के पैरों से चल लें
काँटों से यारी कर लें

दुनिया से जो हमको पाना
है बस वही वही लुटाना

धरती हो ऊबड़ खाबड़
चबाना है प्रेम का आखर

संभालें हम मन की डोरें
बाकी हैं ढेरों उजली भोरें

2 टिप्‍पणियां:

raj ने कहा…

वाह! बहुत अच्छी कवितायें हैं। धन्यवाद। अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा।

Udan Tashtari ने कहा…

वाह! बहुत सुन्दर.