शुक्रवार, 8 मई 2009

धुआँ


कमाल शब्दों का है या उसे जीने वाले का
लिखने वाला हर उस पल को जीता है
तब कहीं जाकर कागज़ पर वो उतरता है

इतना मुश्किल नहीं कविता करना
जितना मुश्किल है उसे जीना

वो जो कागज़ पे छपा होता है
लिखने वाले के सीने से गुजरा है

गुबार है धुएँ का
अक्षरों की शक्ल में उतरा है

जीते मरते हैं कई कई बार
हाथ में जाती है कलम
तो कई मौतों का पता मिलता है

चिंगारियाँ सी उठती हैं
आग जलती तो तमाशा होता
धुएँ का वजूद पिघलता है

पकड़ तो लेते हैं रँग और नूर की लड़ियों को
खुशी की उम्र थोड़ी है
हर बार ये दगा मिलता है

3 टिप्‍पणियां:

डॉ .अनुराग ने कहा…

खुशी की उम्र थोड़ी है
हर बार ये दगा मिलता है


आज सफ्हे पे उदासी है.....

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

खुशी की उम्र थोड़ी है
बात तो सही कही आपने ..सुन्दर लगी आपकी यह रचना

Navneet RAJPUT ने कहा…

बात तो सही कही आपने