मंगलवार, 24 मार्च 2009

ख़ुद से

.


लबों को सीते वक़्त


मन को भी सी लेना


इसको आदत है


टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलने की


अपनी पगडंडी पर


डगमगाता है


सधे क़दमों चलने वालों का


ध्यान नहीं बंटता है


यात्रा का अभिवादन ही


उनके आगे-पीछे बसता है


.



चलता तो है


डगमगाता है तू


बैसाखी पकड़ता तो है


धराशाई भी हो जाए तो क्या


उठ कर फ़िर से चलने का


जज्बा मचलता तो है

2 टिप्‍पणियां:

मा पलायनम ! ने कहा…

उठ कर फ़िर से चलने का

जज्बा मचलता तो है .....
सुन्दर भाव .

रंजना ने कहा…

Waah !! In sankshipt panktiyon me bade hi sundar dhang se gahree baat kahi aapne..

Sundar rachna.