मंगलवार, 31 मार्च 2009

कुछ तो हूँ मैं


मैं कोई नहीं हूँ


कुछ तो हूँ मैं


आस्था और विष्वास का दीपक


जगमगाता हुआ है


क़दमों का मेरे जंगी हौसला


मुस्कुराता हुआ है


कुछ तो मेरे मन ने


सहेजा हुआ है


चलती साँसों को मेरी


महकाया हुआ है


कुछ तो हूँ मैं

3 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

भावों को समेटे हुए

Udan Tashtari ने कहा…

सहज और कोमल अभिव्यक्ति!! बधाई.

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर भावों को समेटे सुंदर रचना ... बधाई।