बुधवार, 8 अप्रैल 2009

उस अजनबी शहर में


६ अप्रैल ०९


नारियल के ऊँचें-ऊँचें पेड़ , कॉपर युक्त मिट्टी के आयताकार खेत , आस पास छितराये से घर और कहीं कहीं पत्थर के पहाड़ .....सिलिकोन सिटी या आई टी सिटी के नाम से मशहूर ये शहर ... जैसे ही प्लेन के पहियों ने बेंगलोर की धरती छोड़ी .....दिल जो पक्का किया हुआ था अचानक बैठने लगा .....पौने तीन घंटे की उड़ान और हजारों मील पीछे छूट जायेगा मेरे जिगर का टुकडा |


बेटी पहली बार इतनी दूर रहने नहीं आई थी , मगर पिछले सवा साल से वो इतनी पास आ गई थी कि हम कई बार मिले | कहते हैं हम दूसरे को नहीं अपने सुखों को रोते हैं ,तो इसे क्या कहूँ , अपने बच्चों को जल्दी जल्दी देख पाने के सुख से वंचित हो गई हूँ | तीनों बच्चे उडे तो एक ही डाल पर बैठ गये ....बस कभी वो हमारी तरफ आते और कभी हम उनसे मिलने जाते पर अब ये बड़ी चिड़िया ने लम्बी उडारी भर ली |


मैं क्यों अपनी संवेदनाओं की बेडियाँ बच्चों के पैरों में डालूँ | अकेले छोड़ आने का अहसास तो तीन दिन पहले दोनों को हो गया था ..जब बेंगलोर में मेरे छह दिन के प्रवास में आधे दिन बीत जाने पर उल्टी गिनती का अहसास हो गया था | लाख रोकने पर भी आँखें छल-छला आईं | जब मन चतुराई करे तो मन को आत्मा की राह दिखानी पड़ती है वरना मन नहीं मानेगा और जब मन हाथ पैर छोड़ दे तो उसे बाहर की राह यानि दुनिया की राह दिखानी पड़ती है , अब सोचना ये था कि सफलता की सीढियां ऐसे ही चढ़ी जाती हैं ....मैं कोई अकेली माँ नहीं हूँ जिसने अपने बच्चों को दूर भेजा है ...ये दुनिया का दस्तूर है ..वगैरह ....वगैरह ...| आँख खोल कर आस पास देखा , एक लेडी अपनी छह महीने की पोती के साथ अकेले श्रीनगर तक की यात्रा के लिये मेरी साथ वाली सीट पर बैठी हैं | ये एक हौपिंग फ्लाईट थी .., शायद उन्हें मेरी मदद की जरुरत थी ....उन्हें बच्ची के लिये दूध बनाना था ....आगे बढ़ कर मैंने बच्ची को उठा लिया | इस तरह कुछ बात शुरू हो गई और उन्होंने बताया कि श्रीनगर में उनका घर और बिजनेस है और बहू वहीं इंजीनियरिंग की परीक्षा देने गई हुई है , और वो खुद पोती के साथ सर्दी भर अपने छोटे बेटे के पास बेंगलोर रहीं थीं , अब बच्चों को यानि बेटे बहू को अपनी बच्ची की याद सता रही है इसलिए वो उसे लेकर लौट रहीं हैं | बच्ची को उन्होंने सोने की चूड़ियाँ पहना रखीं थीं , यानि बच्ची चाँदी के चम्मच के साथ पैदा हुई थी | वो बता रहीं थीं कि जब वो पैदा हुई तो बहुत कमजोर थी , उन्होंने व् उसके डॉक्टर ने बहुत मेहनत करके उसे स्वस्थ्य बनाया है | नई और पुरानी संस्कृति का मेल कुछ इस तरह देखकर अच्छा लगा | और मैंने देखा कि मेरा मन लग रहा है , सचमुच बाहर की दुनिया से तालमेल बैठाए बिना हम चल नहीं सकते , तो मन को बाहर की राह दिखा दे वरना मन अड़ जायेगा | कुछ देर के लिये बच्ची सो गई फिर मैं अपनी बेटी की याद में डूब गई | ये कुछ पंक्तियाँ तो मन पहले से ही गुनगुना रहा था .....


मेरे जिगर के टुकड़े


उस अजनबी शहर में


अकेला नहीं है तू


तेरे आस पास


मेरी दुआओं का घेरा है


जब जब अकेले होना


झुक के तू झाँकना दिल में


अन्दर कहीं हूँ मैं भी


मुड़ के तू देखना पीछे


तेरे साथ-साथ हूँ मैं


तेरे आगे आगे


उजाले की रोशनी है


बस वहीं वहीं


मेरा दिल धड़कता है


खुदा करे


कि तुझे झुक कर , मुड़ कर


देखना पड़े


उजाले हों इतने बिखरे


एक तू और दूसरे उजाले


अकेला कहाँ है तू



4 टिप्‍पणियां:

Shilpa ने कहा…
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Shilpa ने कहा…

'Ek ajnabi shehr mai jab koi apna ho,
toh uss shehr ko apna man lo,
Agar kahein kuch chhuta ho toh,
usse pane ki chah ko jeene ki ass jan lo'

The heriditory factor [:)]

ginusnonu ने कहा…
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ginusnonu ने कहा…
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