मंगलवार, 14 जुलाई 2009

परिन्दा नन्हें परों वाला सो गया


मानसी , बी . ए . प्रोग्राम , हँसराज कॉलेज , दिल्ली यूनिवर्सिटी से किया , पढाई के दौरान पार्ट-टाइम रेडियो जौकी भी रही | इतनी यशस्वी , एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म में एडमिशन लिया , छात्रावास में तीसरे ही दिन बालकनी में फोन सुनते हुए दूसरी मन्जिल से नीचे गिरी | जिन्दगी क्या पानी का बुलबुला है .....एक पल में सब ख़त्म ......हाड़-मांस की गठरी .......बिखरी तो समेटी ही नहीं जाती ?


मेरी बेटी की सहेली की सहेली , क्या गुजरी होगी माँ-बाप पर , अभी तो उसकी उडानें देखनी बाकी थीं और ये क्या कि शक्ल तक देखने से वन्चित , सब ख़त्म हो गया | काश कि जिन्दगी की रील रिवाइंड हो सकती और ऐसे हादसों को हम काट फेंकते |


बतलाओ तो , क्या कह के बहलायें
नीड़ तो है , परिन्दा नन्हें परों वाला सो गया
आसमाँ में , सितारा जगमगा के खो गया
वक़्त को रास न आया , जमीं छोटी पड़ी ,
नन्हें क़दमों का आसमाँ भी खो गया
क़ैद हैं आवाजें तो , शक्ल भी यादों में ,
रास्ता उस तक पहुँचने का खो गया
ढूँढेंगे तुम्हें हम दुलारों में , सितारों में ,
टूटे हैं , किस्मत का सितारा सो गया
परिन्दा नन्हें परों वाला सो गया
बतलाओ तो , क्या कह के बहलायें

5 टिप्‍पणियां:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत मार्मिक रचना...इश्वर ऐसा क्यूँ करता है...???
नीरज

श्यामल सुमन ने कहा…

मार्मिक सत्य।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

mehek ने कहा…

marmsprashi rachana,sach zindagi pani ka bulbula.

Dipti ने कहा…

बहुत ही मार्मिक रचना है। सच है कि हम ऐसे हादसों के बाद खुद को असहाय महसूस करने लगते हैं। कभी-कभी तो खुद को दोषी भी।

LOVE ने कहा…

Bhabhi ji,
Realy its a very heart tuchy poem.
Mukesh Rawal.Kashipur.