बुधवार, 1 जुलाई 2009

क्या वो बेहतर कविता होती है

बिना अपने जख्म दिखाये जो दर्द कह जाए
क्या वो बेहतर कविता होती है


कमी भी सालती है , निशाँ भी मिटते नहीं हैं
छिपा लेती है जो चीर-फाड़
क्या वो बेहतर कविता होती है 


रिसते हैं जख्म रोशनी में मगर , अंधेरे का
वो भरम पालती है
क्या वो बेहतर कविता होती है


तैरते हैं जो सुख-दुःख जीवन में , हू-ब-हू उतार देती है
उनका प्रतिबिम्ब
क्या वो बेहतर कविता होती है


हर किसी को लगे ये है उसकी ही बात
बदल देती है छू के ये उसके ही तार
क्या वो बेहतर कविता होती है


खुशी की हो या हो गम की बात
थोड़ा कहते ही बयाँ होती हैं गहरी बातें
क्या वो बेहतर कविता होती है


4 टिप्‍पणियां:

‘नज़र’ ने कहा…

बहुत ही सुन्दर काव्य प्रस्तुति है

Udan Tashtari ने कहा…

विचारणीय अभिव्यक्ति!!

रंजना ने कहा…

Ise kewal kavita na kah paungi....aapka chintan vicharneey hai....

Sundar kavita ke liye aabhar swikaren.

pramod ने कहा…

'हर किसी को लगे ये है उस की ही बात, बदल देती है उसके ये छूते ही तार' वास्तव में एक अच्छी कविता के अंग होने चाहिए. बधाई दिल को छूने वाली कविता प्रस्तुत करने के लिए.