रविवार, 26 जुलाई 2009

हरी है वो डाली


छुट्टियाँ बिता कर बच्चों के वापिस लौटने का समय


जो ये दिन आता है तो वो दिन भी आता है
यही कह कर दिलासा देते हैं
जुदाई आती है तो मिलन भी सजता है
खामोश दिये रौशन होते , पतझड़ भी मुस्कराता है
हरी है वो डाली , मौसम तो आने जाने हैं
फ़िर आयेगी रुत मौसमे-गुलदाउदी की
मिलन की आस लिये विष्वास पानी पीता है
विरह किनारे रख के जीता है
कभी तो होगी मेरे मन की
यही कह कर दिलासा देते हैं
जो ये दिन आता है तो वो दिन भी आता है

5 टिप्‍पणियां:

‘नज़र’ ने कहा…

बहुत सुन्दर!
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1. विज्ञान । HASH OUT SCIENCE
2. चाँद, बादल और शाम

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जो ये दिन आता है तो वो दिन भी आता है

अच्छी रचना है............. AKSAR ऐसा होता है ............

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi sundar rachana ......badhaai

M VERMA ने कहा…

बेहतरीन

अर्चना तिवारी ने कहा…

बहुत खूबसूरत कविता .... शारदा जी आपका सुझाव मान लिया...अच्छा लगा आप मेरे ब्लॉग पर पधारीं...स्नेह बनाए रखिएगा..