मंगलवार, 7 अक्तूबर 2008

जियो और जीने दो

थोड़ी मिट्टी पौधों के साथ रहने दो
मुरझा जायेंगे ये ,जड़ों से उखड़ने के ख्याल से

मिट्टी -मिट्टी मत कर लेना ,
अपनी खुशबू फैलाने के धमाल से

कितनी ही तरह के फूल सजे
खुशबू न किसी की कम होती

गुलशन का लाड़ दुलार सदा
माँ का उपकार नहीं मिटता

न मिटता बचपन यादों से
आसमान से कैसे बांटेगा खुशियाँ

फूलों के दिल में रहना होगा
सबको मिट्टी में खिलने दो

जियो और जीने दो सबको
अपना जीना न बेहाल करो

दरख्तों से पूछो किस मजबूती से
कड़े हैं ये मिट्टी को

पर क्या फूलों का जीना दुशवार हुआ ?
मिट्टी ,पानी संग हवा जरूरी है

चारों ओर जो छा जाती ,खुशबू की मजबूरी है
फुहारें बन सबकी खुशबू लो

1 टिप्पणी:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

जियो और जीने दो ...वाह बहुत सच्ची और अच्छी रचना...बधाई.
नीरज