मंगलवार, 29 जून 2010

थोड़ी दूर वो साथ चलें

थोड़ी दूर वो साथ चलें तो 
अपना आप भी अच्छा लगता है
अरमानों की इन गलियों में
सपना सा भी सच्चा लगता है

अपने दिल की बात कहूँ मैं
मुड़ के आयें वो मौसम जो
अपनों का सँग-साथ सुहाना अच्छा लगता है

बहुत है चाहा हमने तुमको
कह न पायें वही बात जो
दिल माँगे वही साथ पुराना अच्छा लगता है

थोड़ी दूर वो साथ चलें तो
अपना आप भी अच्छा लगता है
अरमानों की इन गलियों में
सपना सा भी सच्चा लगता है

शनिवार, 19 जून 2010

माली के चमन में उगते हैं गुलाब

फादर्ज़ डे पर

माली ने , बागबाँ ने सीँचा है प्यार से
उसके उसूलों ने रखा हिफाज़त से
कानून-कायदे , रस्मों-रिवाज़ जो पहले थीं बन्दिशें
आदत में उतर आईं तो बनीं वजूद की जुम्बिशें
हद के अन्दर जुनूँ की कोई हद नहीं
हद के अन्दर चाहत की कोई हद नहीं
ठोकर खाना , गिरना , फिर चलना और जोश से ; सिखाया अपनी मिसाल से
ज़िन्दगी तेरे लटके-झटके , नित नये पटके , हैं ये किस अन्दाज़ से
समाज का कारोबार है उसूलों के दम पे ,
अमनो-अदब पे है दुनिया कायम ,
हो सके तो इन्सानियत की मीनार बन के देख
दुनिया पहचाने तो क्या गम है ,
गर्म-जोशी का रँग कुछ हमने भी भरा है ,
अपनी चित्रकारी उठा के देख
हर बागबाँ को फूल खिलने की आस होती है
काँटों में उलझ जाने के डर से कोई राह छोड़ता नहीं
उगते होंगे कुकुरमुत्ते रेगिस्तानों में ,
मेरे माली के चमन में उगते हैं गुलाब ,
और उगता है काँटों में भी फूलों की महक का ऐतबार ..!

बुधवार, 16 जून 2010

ईंट-गारे से छत नहीं होती

आज फिर अखबार में पढ़ा ...ऑनर किलिंग ...एक और बेटी भेँट चढ़ गई...
जाने वाली की नजर से ...
घर के बाहर तो छत तो नहीं होती
घर के अन्दर ही मेरी छत छीनी क्यों कर ?
मेरे सिर पर जो लहराता था बादल बन कर
उसी बादल की नमी सोखी किसने
बिजली बन कर मेरी साँसों की गति रोकी किसने
मेरी छत की मजबूती में छेद हुए
ममता का आँचल भी न महफूज़ हुआ
पराये घर में मैं पलती रही
मेरे अपनों में कोई मेरा सगा न हुआ
जिन्दगी सबको प्यारी है
मेरी साँसों से मेरे माली को ऐतराज़ हुआ
मेरी छत के नीचे , किसकी दुनिया है अन्धेरी
और कौन गुनहगार हुआ
ईंट-गारे से छत नहीं होती
प्यार का चमकता रँग न मेरी छत का नसीब हुआ !

गुरुवार, 10 जून 2010

नजर की गुफ्तगू

यूँ ही नहीं ढूँढती हैं आँखें , किसी को बेसबब
दिल से दिल की राह जाती है , यूँ झलक

जाते हुए जो नजर उठा कर भी न देखा उसने
बिन कहे समझो के हम उसके दिल से गए उतर


मायूसी के मन्जर हैं या दिल का कमल खिला
बात इतनी सी पे रिश्तों के मायने जाते हैं बदल


नजर की गुफ्तगू नहीं कहने की बात है
नर्मियाँ , तल्खियाँ दूर तक चलती हैं बेहिचक


यूँ ही नहीं ढूँढती हैं आँखें , किसी को बेसबब

दिल से दिल की राह जाती है , यूँ झलक

गुरुवार, 3 जून 2010

संवेदनाएँ छलती हैं

संवेदनाएँ चलती हैं
ऊँचा हो जाता है जब
क़द सर से
संवेदनाएँ छलती हैं ।
मुश्किल है
मन चलता है
पकड़ के मुट्ठी में रखना
खलता है ।
मन के पानी पर
बनती बिगड़ती तस्वीरें
बहुत बोलती हैं ;
मौका लगते ही
बाँध के सारे द्वार खोलती हैं ।
कोई ऐसी दिशा दे
कि न रोये नादाँ
खुद को छल के ही
न खुश होवे इंसाँ ।
संवेदनाओं के पँख
अगर हों उजले
धुल जाए मन का मैल
पारदर्शिता के तले ।
संवेदनाओं को
दिशा मिलती है
दशा बदलती है ।