शनिवार, 19 जून 2010

माली के चमन में उगते हैं गुलाब

फादर्ज़ डे पर

माली ने , बागबाँ ने सीँचा है प्यार से
उसके उसूलों ने रखा हिफाज़त से
कानून-कायदे , रस्मों-रिवाज़ जो पहले थीं बन्दिशें
आदत में उतर आईं तो बनीं वजूद की जुम्बिशें
हद के अन्दर जुनूँ की कोई हद नहीं
हद के अन्दर चाहत की कोई हद नहीं
ठोकर खाना , गिरना , फिर चलना और जोश से ; सिखाया अपनी मिसाल से
ज़िन्दगी तेरे लटके-झटके , नित नये पटके , हैं ये किस अन्दाज़ से
समाज का कारोबार है उसूलों के दम पे ,
अमनो-अदब पे है दुनिया कायम ,
हो सके तो इन्सानियत की मीनार बन के देख
दुनिया पहचाने तो क्या गम है ,
गर्म-जोशी का रँग कुछ हमने भी भरा है ,
अपनी चित्रकारी उठा के देख
हर बागबाँ को फूल खिलने की आस होती है
काँटों में उलझ जाने के डर से कोई राह छोड़ता नहीं
उगते होंगे कुकुरमुत्ते रेगिस्तानों में ,
मेरे माली के चमन में उगते हैं गुलाब ,
और उगता है काँटों में भी फूलों की महक का ऐतबार ..!

3 टिप्‍पणियां:

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

बागबां के प्रति..
सुन्दर शब्दों में पिरोई गई...
इन पवित्र भावनाओं को सलाम.

shama ने कहा…

Oh! Are wah! Yah bhee nihayat sundar rachna hai! Link ke liye bahut,bahut shukriya!

स्वाति ने कहा…

sunder kavita , jo dunia ke sabhi pitao ko samarpit hai.
dhanywad, ise padhwane ka .