गुरुवार, 3 जून 2010

संवेदनाएँ छलती हैं

संवेदनाएँ चलती हैं
ऊँचा हो जाता है जब
क़द सर से
संवेदनाएँ छलती हैं ।
मुश्किल है
मन चलता है
पकड़ के मुट्ठी में रखना
खलता है ।
मन के पानी पर
बनती बिगड़ती तस्वीरें
बहुत बोलती हैं ;
मौका लगते ही
बाँध के सारे द्वार खोलती हैं ।
कोई ऐसी दिशा दे
कि न रोये नादाँ
खुद को छल के ही
न खुश होवे इंसाँ ।
संवेदनाओं के पँख
अगर हों उजले
धुल जाए मन का मैल
पारदर्शिता के तले ।
संवेदनाओं को
दिशा मिलती है
दशा बदलती है ।

11 टिप्‍पणियां:

shikha varshney ने कहा…

बहुत सुन्दर ढंग से संवेदनाओं को उकेरा है

M VERMA ने कहा…

संवेदनाएँ चलती हैं
ऊँचा हो जाता है जब
क़द सर से
संवेदनाएँ छलती हैं ।
सम्वेदनाओं को सम्वेदनात्मक रूप से व्यक्त किया है
सुन्दर

माधव ने कहा…

सुन्दर रचना

दिलीप ने कहा…

behad sundar rachna

Shekhar Kumawat ने कहा…

sahi he sanvednaye chalkti he

राज भाटिय़ा ने कहा…

मन के पानी पर
बनती बिगड़ती तस्वीरें
बहुत बोलती हैं ;
मौका लगते ही
बाँध के सारे द्वार खोलती हैं ।
अति सुंदर भाव,बहुत अच्छी लगी आप की यह रचना

sangeeta swarup ने कहा…

बहुत खूबसूरती से संवेदनाओं की बात कही है...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कल मंगलवार को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है



http://charchamanch.blogspot.com/

शारदा अरोरा ने कहा…

संगीता जी , विभिन्न फूलों की खुशबू से चर्चामंच महकता नजर आया । मैं ये मानती हूँ कि जैसा हम महसूस करते हैं वैसा ही हमारा व्यक्तित्व बन जाता है , और हमारे अहसास कितनी ही बार हमें छल जाते हैं , यही बात कही है संवेदनाएं छलती हैं में ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

संवेदनाएँ जब छलकती हैं तो अंदर तक नम कर जाती हैं ... भिगो जाती हैं दिल को ...

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

sach kaha apni samvednaye hi chhalti hai.bahut gahri baat.