शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

तुझमें वो मूरत

मेरे सपनों में आते हो जब तुम
बहुत बातें करते हो
आँख खोलती हूँ जब मैं
पास बैठे हो देखती हूँ
वही अक्स ढूँढती हूँ
पूछती हूँ जब मैं कि
' क्या हुआ '
' क्यों ' तुम्हारा जवाब है
या कि सवाल ?
सवालों सवालों में उलझे हैं हम
वही है सूरत , वही है सीरत
जब तक मैं ढूँढू
तुझमें वो मूरत
ये दुनिया ख़ूबसूरत है
ये दुनिया ख़ूबसूरत है

6 टिप्‍पणियां:

माधव ने कहा…

wah wah

मनोज कुमार ने कहा…

सच ये जो "क्यों" होता है, वह सवाल की तरह आता है या जवाब की तरह पता ही नहीं चलता। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
स्वरोदय विज्ञान – 10 आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सूंदर रचना धन्यवाद

M VERMA ने कहा…

ये दुनिया ख़ूबसूरत है

वाकई दुनिया खूबसूरत है

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

सवालों सवालों में उलझे हैं हम
वही है सूरत , वही है सीरत
जब तक मैं ढूँढू
तुझमें वो मूरत
ये दुनिया ख़ूबसूरत है
ये दुनिया ख़ूबसूरत है...

बहुत उम्दा.

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-बाबा नागार्जुन, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें