शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

तार-तार सारी कहानी

कमजोर हो जाते हैं वो हिस्से
वक्त की चादर में पैबन्द लगे

चुक जायेगी उम्र सारी
ये कलाकारी रफू ही लगे

रफूगर के माथे पे शिकन
फनकारी भी मजबूरी ही लगे

गोटे-किनारी , सलमे-सितारे
हसरतों को ओढ़नी लगे

उम्र लगे सीते हुए
पलक झपकते ही रँग बदरँग लगे

टाँका-टाँका सिले लम्हे-लम्हे के सितम
टूटा टाँका तार-तार सारी कहानी ही लगे

7 टिप्‍पणियां:

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

रफूगर के माथे पे शिकन
फनकारी भी मजबूरी ही लगे
गोटे-किनारी, सलमे-सितारे
हसरतों को ओढ़नी लगे...
बहुत खूबसूरत...अलग अंदाज़.

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
मशीन अनुवाद का विस्तार!, “राजभाषा हिन्दी” पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

अंक-9 स्वरोदय विज्ञान, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

उम्र लगे सीते हुए
पलक झपकते ही रँग बदरँग लगे
............................
बड़ी भावप्रधान अभिव्यक्ति......

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अद्भुत रचना...शब्द और भाव दोनों लाजवाब...

नीरज

इमरान अंसारी ने कहा…

जज़्बात पर आपकी टिप्पणी का तहेदिल से शुक्रिया..........बहुत ही सुन्दर रचना है आपकी ........आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा .............आगे भी ऐसे ही बढ़िया पड़ने को मिलेगा इस उम्मीद में आपको फॉलो कर रहा हूँ | ये पंक्तियाँ बहुत पसंद आयीं -

"चुक जायेगी उम्र सारी
ये कलाकारी रफू ही लगे

रफूगर के माथे पे शिकन
फनकारी भी मजबूरी ही लगे"

कभी फुर्सत में हमारे ब्लॉग पर भी आयिए-
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एक गुज़ारिश है ...... अगर आपको कोई ब्लॉग पसंद आया हो तो कृपया उसे फॉलो करके उत्साह बढ़ाये|

इमरान अंसारी ने कहा…

अरे, आपके ब्लॉग पर मुझे कहीं भी फॉलो का आप्शन नहीं मिला |