रविवार, 22 अगस्त 2010

इसके सिवा कुछ भी नहीं मैं

मैं एक नन्हीं बच्ची हूँ
सारी उम्र ज़हन में ,
बचपन ही बोलता रहा
माँ सी कोई गोदी ,
पिता का सर पे हाथ ही खोजता रहा

मैं एक पत्नी हूँ
मन चकोर की तरह ,
पिया के इर्द-गिर्द ही डोलता रहा
सूरज चढ़ता उसी की देहरी पर ,
वही साँझ के पट खोलता रहा

मैं एक माँ हूँ
जिगर के टुकड़ों में मन ,
अपना ही अक्स टटोलता रहा
हर कोई ढूँढता है पहचान ,
रिश्तों को तोलता रहा
अपने ही वजूद का हिस्सा है जो ,
टुकड़ों में बोलता रहा

2 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

कविता काफी अर्थपूर्ण है!

राज भाटिय़ा ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति। आभार