बुधवार, 11 अगस्त 2010

जख्म जो फूलों ने दिये

फूलों के जख्म यानि संवेदन-शील रिश्तों की मार के जख्म , सजा के बैठे थे फूलदानों में यानि रिश्तों को ..मार के जख्मों को ..दायरों की दीवारों में बाँध के बैठे थेअब ये पोस्ट वन्दना जी के नाम ..इस का श्रेय उनके ब्लॉग 'जख्म जो फूलों ने दिए ' को जाता है...
जख्म जो फूलों ने दिये
हाय सजा के बैठे थे , फूलदानों में
अहसास भूलों ने दिये
रुका पानी गन्दला हो जाता है
बहते जीवन में दर्द शूलों ने दिये
कितनी मासूमियत से खिलते हैं
वफ़ा की राह में वक्ती झूलों ने दिये
अपनों के हाथ अपनी नब्ज देखो तो
उठे जो हाथ उन्हीं वसीलों ने दिये
जख्म जो फूलों ने दिये

4 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

शारदा जी,
आपने तो फूलों के ज़ख्मों पर मरहम लगा दिया………………आपके उदगार ,आपकी भावनाओं को मेरा नमन है……………………।
हाय सजा के बैठे थे , फूलदानों में
अहसास भूलों ने दिये
वाह …………अब इन अहसासो के लिये कहाँ से शब्द लाऊं।

अपनों के हाथ अपनी नब्ज देखो तो
उठे जो हाथ उन्हीं वसीलों ने दिये
जख्म जो फूलों ने दिये

इन पंक्तियों ने तो जैसे सारा सच कह दिया……………बडी गहराई से महसूस किया है आपने ज़ख्मो के दर्द को।

आपने मुझे निशब्द कर दिया।

मनोज कुमार ने कहा…

भावुकता से भरी संवेदनशील पंक्तियां।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरती से आपने लिखा है ....

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

गहरे भाव...दिल को छूने वाले जज़्बात हैं.