रविवार, 1 अगस्त 2010

तेरे मटके के पानी का वो हिस्सा

दोस्ती के जिस जज्बे ये नज्म लिखवाई , उस जज्बे को सलाम ...
आज फ्रेंडशिप डे है जी ...मेरी राहों के हमनवाँ
तेरे मटके के पानी का वो हिस्सा
जो सारे का सारा मेरा है
अब ये मेरी मर्जी है कि
मैं उसे पिऊँ या माथे से लगाऊँ
या फिर धोऊँ राहों के हादसे
और ये तेरी मर्जी है कि
तू उसे रक्खे हिफाज़त से या कि छलकाए
मेरा भी कुछ हक़ है उस पर
कि उसे तकती निगाहें मेरी भी हैं
तेरे मटके के पानी का वो हिस्सा
जो सारे का सारा मेरा है
इतनी भी नहीं सँग-दिल मैं
कि उसे बाँट न पाऊँ
जब जानती हूँ कि तेरे लिए मेरे जैसे कई और हैं
मेरे लिए इतनी है बहुत
मेरे हिस्से की धूप , सारी की सारी , पूरी की पूरी
मुझे तो रश्क है तुझ पर ,
क्या तुझे भी रश्क है अपनी रहनुमाई पर
तेरे मटके के पानी का वो हिस्सा

7 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

बहुत खूब
सुन्दर ढंग से हक जताया है

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

बहुत अच्छी रचना...
मित्रता दिवस पर शुभकामनाएं.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत खुब सुरत, दोस्ती के नाम, हमारा तो हर दिन एक मित्र दिन होता है, शुभ दिन

mai... ratnakar ने कहा…

ultimate writting, bahut hee achchha likhane ke liye kripaya badhai sweekar karen

mridula pradhan ने कहा…

wah .bahot achche .

नीरज गोस्वामी ने कहा…

सुन्दर रचना...बधाई..
नीरज

Kusha ने कहा…

beautiful poem....