सोमवार, 18 जनवरी 2010

मन का पखेरू तो

रुक कर जरा सोचें कि मन क्या तलाशता है ........

मन का पखेरू तो चुगता है सोना
ये इसकी ज़िदें हैं , ये इसकी हदें हैं
कितना भी समझाओ , समझे न बैन...

काया के पिन्जरे में आवाजें भली हों
कल हो न हो , ये दिन रैन .........
मन का पखेरू तो चुगता है सोना

जग को दिखावा , लगता भला है
मन तो ढूँढे , अपनी ज़मीं अपना चैन ...
मन का पखेरू तो चुगता है सोना

सुगना की रट है , समझा न कोई
सोने का दाना , हथेली पे रखता न कोई
अटका गले में , चबेना चबै न ......
मन का पखेरू तो चुगता है सोना


6 टिप्‍पणियां:

ह्रदय पुष्प ने कहा…

मन का पखेरू तो चुगता है सोना
ये इसकी ज़िदें हैं, ये इसकी हदें हैं
कितना भी समझाओ, समझे न बैन..
सुंदर रचना के माध्यम से बहुत सही और सच कहा आपने.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जग को दिखावा , लगता भला है
मन तो ढूँढे , अपनी ज़मीं अपना चैन ...

मन तो पागल है जग की रीत नही जानता ......... बहुत ही लाजवाब लिखा है .......

अजय कुमार ने कहा…

शानदार रचना , बधाई

निर्मला कपिला ने कहा…

जग को दिखावा , लगता भला है
मन तो ढूँढे , अपनी ज़मीं अपना चैन ...
बहुत सुन्दर और सही है कितना भी कुछ अच्छा हो मगर म को और आगे तलाश रहती है । रचना दिल को छू गयी। बधाई

sidheshwer ने कहा…

बढ़िया रचना !

राज भाटिय़ा ने कहा…

जग को दिखावा , लगता भला है
मन तो ढूँढे , अपनी ज़मीं अपना चैन ...
बहुत सुंदर रचना, भाव पुर्ण
धन्यवाद