गुरुवार, 13 अगस्त 2009

निरीहों को क्या मालूम

मेले के दिनों में शहर से बाहर निकलते ही देखा कि एक चरवाहा बकरियों को हाँकता हुआ शहर की तरफ़ ला रहा है , पहला ख्याल दिल में यही आया कि ये या तो धर्म के नाम पर बलि चढेंगी या दुकानदारों और होटल वालों को बेची जायेंगी , आख़िर हश्र वही है
अय्यड़ को हाँका है शहर की ओर
निरीहों को क्या मालूम
चलना है सहर की ओर


भेँट चढ़ना है
धर्म का या स्वाद का जोर
खिलाता था , पिलाता था
मण्डी में बोली लगाता था
खून सने हाथ
सफाई पसन्द हैं
ताने-बाने बुनते दिमाग
पाक हैं , सलीका पसन्द हैं


कब्रिस्तानों से पेट
अटे हैं अपनी वफाओं से
आदमी के मुँह खून लगा
जँगल हो या शहर
एक ही बात है
निरीहों को क्या मालूम
चलना है सहर की ओर



6 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi gaharaee hai aapaki kawita ke bhaaw me ........bilkul pure ......bahut hi sundar

M VERMA ने कहा…

खून सने हाथ
सफाई पसन्द हैं
कितनी गहराई मे उतरी होंगी आप इन दो पंक्तियो के लिये.
पूरी रचना व्यथा की एक कथा है.

अर्शिया अली ने कहा…

Hriday sparshee.
( Treasurer-S. T. )

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

गहरे भावों से जन्मी रचना

AlbelaKhatri.com ने कहा…

shaardaaji,
aisaa prateet hota hai mano...svyam ma shaardaa ne apne haath se likh kar ye rachnaa aapko bhent ki ho...........
antar ki vednaa, karunaa aur nireeh ki marmaantak peeda ko itnee siddhta k saath srijit kar aapne hindi saahitya ke liye ek anupam kriti rachee hai
main aapko hriday se naman karta hoon.........

pramod ने कहा…

इसी नन्दाष्टमी के दिन आफिस जाते समय दो लड़कों को रिक्सा स्टैंड के पास बोरी में भारी सी कोई चीज ले जाते देखा. जब वे पास से गुजरे तो उस बोरी से बकरी के दो पैर बाहर निकले देखे. मन दर्द से भर गया और देर तक तकलीफ में रहा. आपकी भावुक रचना की बार बार याद आती रही .