सोमवार, 28 जनवरी 2013

रिश्तों को चाहिये

कड़वे से घूँट 
सब्र के प्याले से 
हाय क्या अन्दाज़ हैं 
दर्द के निवाले से 

पाए हैं ज़ख्म 
गुलाबों की चाह में 
ज़िन्दगी की राह में 
क़दमों तले छाले से 

आपका हमारा साथ 
बस यहीं तक था 
रिश्तों को चाहिये 
जमीं भी हवाले से 

चला के पानी पे 
भला क्या पायेंगे 
बुलबुले जुगनू से 
महज़ उजाले से 

गढ़ता है वक्त 
भट्टी में कुन्दन को 
ज़िन्दगी के ये भी 
अन्दाज़ हैं निराले से 

2 टिप्‍पणियां:

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (30-01-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
सूचनार्थ |

कविता रावत ने कहा…

पाए हैं ज़ख्म
गुलाबों की चाह में
ज़िन्दगी की राह में
क़दमों तले छाले से
....जिंदगी में जो सोचो सब अपने अनुरूप हो जाय तो फिर क्या बात ..लेकिन कल जाने क्या होगा यह कोई नहीं जान पाया है ....
गहरे अनुभव ....