गुरुवार, 17 जनवरी 2013

रवानी की तरह चल

वक्त देता नहीं मोहलत 
कहानी पूरी हो जाती है 
फिसल जाती है हाथों से 
ज़िन्दगानी अधूरी हो जाती है 

ज़िन्दगी,  ढीठ हो जाने तलक 
या पिघल जाने तलक 
इम्तिहान है शायद 
फिर न बचता है तू 
न ज़िन्दगी ही बच रहती है ,
सूनी हो जाती है 

दूर के मकान से  
धुआँ-धुआँ सा उठता हो जैसे 
कोई नहीं है तेरे लिए 
जलना है तो औरों के लिए जल 
नमी तेरी ही मिटा डालेगी तुझे 
बुझते हुए हौसलों में ,
रवानी की तरह चल 
रात भी सुबह सी सुहानी हो जाती है ,
कहानी हो जाती है


वक्त देता नहीं मोहलत 
कहानी पूरी हो जाती है 
फिसल जाती है हाथों से 
ज़िन्दगानी अधूरी हो जाती है 



4 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

वक्त देता नहीं मोहलत
कहानी पूरी हो जाती है
फिसल जाती है हाथों से
ज़िन्दगानी अधूरी हो जाती है
...वक्त पर किसी का जोर नहीं चलता ....
बहुत बढ़िया प्रस्तुति

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

प्रभावशाली ,
जारी रहें।

शुभकामना !!!

आर्यावर्त (समृद्ध भारत की आवाज़)
आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत ही सुंदर भावाव्यक्ति बधाई ......

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

लाजवाब प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...