सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

ढूँढना पड़ता है

राह चलते यूँ ही नहीं मिल जाता है मकसद 
ढूँढना पड़ता है अपनी धड़कनों का भी सबब 

किस राह से आये सुकूँ , किस रास्ते आये बिखराव 
टूट के बिखरे तो साथ आये जुड़ने का भी सबक 

चढ़ के उतरे पारा तो भूल जाता है सारा ताप 
ऊँचाई पर चढ़ना ही हो गया निढाल पड़ने का सबब 

अकड़ के टूटेगा तो टुकड़ों में नजर आयेगा  
नर्मी से झुकना ही है साबुत बच पाने का सबक 

नहीं जाता बेकार भटकना ये देखना 
सहरा का कोई किनारा तो बनेगा उबार लेने का सबब 

1 टिप्पणी:

"अनंत" अरुन शर्मा ने कहा…

वाह सुन्दर अति सुन्दर उम्दा रचना