मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

मैं हूँ एक परिन्दा

मैंने देखा कि मैं हूँ एक परिन्दा
जल थल है मेरे क़दमों में
और पँखों में सिमटा नभ है
नन्हीं नन्हीं मेरी उड़ानें
दिखता सारा जग है
मिल जुल कर सब साथी उड़ते
कोई बन्धन कहीं नहीं है
मैं उड़ता सागर की लहरों के ऊपर
आसमान की बाहों में
हर बार पलट आता हूँ
धरती के उसी घरौंदे में
जो जोड़े मुझको धरती से
मेरी अपनी खुशबू
मेरे अपनों का अपनापन
मेरी यादों का पुलिन्दा
है मेरी उड़ानों का परिन्दा

3 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

मेरी यादों का पुलिन्दा
है मेरी उड़ानों का परिन्दा
सुन्दर है ये परिन्दा और पुलिन्दा

वन्दना ने कहा…

bahut hi sundar bhav.

Ravi Rajbhar ने कहा…

jabab nahi aapke vicharo ka.!