रविवार, 28 मई 2017

और ज़माना धूप ही धूप

दुनिया की सारी माँओं के लिये 

माँ  ये क्या बात है कि 
सुख में तुम मुझे याद आओ या न आओ 
दुख में तुम हमेशा मेरे सिरहाने खड़ी होती हो 
जब मैं नन्हीं बच्ची थी 
मैंने पहचाना पहला स्पर्श तुम्हारा ही 
मेरे आने से पहले ही तुमने ,
सजा लिया था मुझसे अपना सँसार 
फूलों सा तुमने पाला मुझको 
बिन माली गुलशन का रूप है क्या 
ज़िन्दगी ने लिये कितने ही इम्तिहाँ 
हर ठोकर पर निकला मुहँ से ' हाय माँ '
माँ तुम ठण्डी छाया हो 
और ज़माना धूप ही धूप 
ये जीवन है माँ की बदौलत 
माँ की महिमा ऐसी अनूप 

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