मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

नैनीताल और लकड़ी का घर


लकड़ी का घर है अपना 
जैसे हो कोई हाउस-बोट 
इधर झील है 
झील में चँदा 
हिलते अक्स और छतें हैं ढलवाँ 
उधर पहाड़ है 
खुला आसमान है 
सर पे सूरज रोज है आता 
बहुत बुलाते , उसे गुमान है
बादल में है छुप-छुप जाता 
रोज है सजती चाँद तारों की महफ़िल 
साँझ के हाथों में वरदान है 
रँग जाते हैं ज़ेहन अपने 
चाय का प्याला हो हाथों में 
भर के नज़र जब देखें हम 
खुदा अपना भी कितना मेहरबान है 
सैलानी की आँख से देखूँ 
अपना घर भी अच्छा लगता है 
वही शहर है , हर बार नया सा 
फूलों का इक गुच्छा लगता है 
नैनीताल है , ये नैनीताल है 
रँग-बिरँगा कोई सपना लगता है    

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