शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

जो अभी हारा नहीं है

दुआ में उठते हुए हाथ भी थक गये हैं 
नाराज़गी भी कर देती है ज़िन्दगी से महरूम 
दरक रहा है वक़्त 
उम्र पसीने-पसीने है 

इकतरफा जतनों से कोई बात कहाँ बनती 
मेरी कश्ती में चन्दा भी है ,चाँदनी भी है 
झील में अक्स भी है 
लम्स , हाथों से कुछ छूट गया है 

मील के पत्थर भी तकते हैं दायें बाएं 
अभी बची है जान मुसाफिर 
परवाज़ को समन्दर है 
धरती और गगन रूठ गया है 

वक्त मेरा सगा हुआ ही नहीं 
उसने वही चीज दबा कर रख ली 
शिद्दत से जो चाही 
अब यकीं के दफ्तर में , दुआ पानी भरती है 
तमन्ना गर्द बुहारती है 
मगर कुछ है , जो अभी हारा नहीं है 

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