शुक्रवार, 21 जून 2013

नामोँ-निशाँ न कल का

उत्तरा-खण्ड में हुई भारी तबाही से उपजी ये पंक्तियाँ ...

त्राहि-त्राहि कर उठा हिमालय ,
फटा है सीना धरती का 
केदार-नाथ , भगवान शिव की नगरी ,
और ताण्डव जल का 
किस्मत के आगे हर कोई हारा ,
कहाँ ठिकाना पल का 

शिव है आदि ,अन्त भी शिव ही 
एक अकेला शिव ही सत्य है 
एक प्रवाह में बहे सभी 
नामोँ-निशाँ न कल का 

ढह गईं इमारतें ताश के पत्तों सी 
लाया सैलाब है पत्थर ,लाशें ,
मौत का ताण्डव , उजड़ा मन 
और ज़िन्दगी सोच रही है 
अपने छूटे , सपने रूठे 
बेकस हाल है मन का 

टूटी छत है , पेट में दाना नहीं अन्न का 
ये तो बताओ , कहाँ है मरहम 
यादों के रिसते जख्मों का 
त्राहि-त्राहि कर उठा हिमालय ,
फटा है सीना धरती का 

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