गुरुवार, 30 मई 2013

ये लीची और आम के पेड़

ये आँगन में खड़े लीची और आम के पेड़  
झुक गईं हैं डालियाँ फलों के बोझ से 
बरसों से खड़े हैं राह तकते 
बोता है कोई और , खाता है कोई और 

जीते हैं हम अपने जतनों से 
पाते हैं सदा फल अपने कर्मों का 
फलदार हों , छायादार हों 
कौन आता है तेरे साये में पलने को 

दिल ने माँगा सदा पुराना 
ज़ेहन आगे देख न हारे 
नन्हें पौधे जवाँ हुए हैं 
और जवाँ दिल हुए हैं बूढ़े 
झुक-झुक आई हैं डालियाँ 
धरती से कुछ कहती हुईं 
हजारों मील दूर है कोई 
मिट्टी की महक को सीने से लगाये हुए 
कोई कैसे है इन नजारों को भुलाये हुए 

2 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जीते हैं हम अपने जतनों से
पाते हैं सदा फल अपने कर्मों का
फलदार हों , छायादार हों
कौन आता है तेरे साये में पलने को ... Bahut khoob kaha hai ... Sach kaha hai ... Sab karmon se hota hai ... Lajawab ...

अरुन शर्मा 'अनन्त' ने कहा…

आदरणीया बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति बहुत खूब हार्दिक बधाई