मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

कभी जो नाम

कभी जो नाम तुमने हमें दिया था 
अब न वो याद है , न चाहत ही बाकी 
वक्त मिटा देता है क़दमों के निशाँ 
यूँ ही नहीं कहते मरहम इसको 
ये तो आदमी की फितरत है 
कुरेद-कुरेद के ज़िन्दा रखता है ज़ख्म अपने 
उस ओर से अब कोई ,
आवाज़ न लगाये मुझको 
मैं बहुत दूर चली आई हूँ 
यूँ तो अब असर होता नहीं 
रंजो-गम तन्हाई का 
वो लड़क-पन बहुत पीछे छोड़ आई हूँ 
न वो दिल है , न नज़ारे हैं 
बेमायने हुए सारे 
फिर भी न छेड़ना तुम कोई तार 
मुझे आज़माने के लिये 
कभी जो नाम तुमने हमें दिया था 



1 टिप्पणी:

Madan Mohan Saxena ने कहा…

वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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