मंगलवार, 14 जून 2011

दम है अपना

सालों बाद बच्चों के साथ हरमन्दर साहिब , गोल्डन टेम्पल , अमृतसर आई हूँ । सरोवर के पास बैठ कर शबद-कीर्तन सुन रही थी ......
बाबा मेरे तेरा सदका
तू सच्चा साहिब
तू रखवाला , सदा सदा
मुँह पर जल के छींटे डाले और सच्चे पातशाह के लिये मन ने गुनगुनाना शुरू किया । शबद की ये तीन पंक्तियाँ मैंने भी चुरा लीं , और उसी लय में गाया ....आवाज भी मेरी है और स्टेंजाज़ भी मेरे हैं ......
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बाबा मेरे तेरा सदका
तू सच्चा साहिब

तू रखवाला , सदा सदा

रूह मेरी को तू नहला दे
जन्मों की मैं मैल मिटा लूँ
गठरी सिर पर बहुत है भारी
रख के किनारे थोड़ा सुस्ता लूँ


बाबा मेरे तेरा सदका
तू सच्चा साहिब
तू रखवाला , सदा सदा


रोग कोई भी थोड़ी देर का साथी
पीड़ से दामन अपना छुड़ा लूँ
बैसाखी नहीं तू , दम है अपना
जब जी चाहे तुझको बुला लूँ


बाबा मेरे तेरा सदका
तू सच्चा साहिब
तू रखवाला , सदा सदा

3 टिप्‍पणियां:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

रूह मेरी को तू नहला दे
जन्मों की मैं मैल मिटा लूँ
गठरी सिर पर बहुत है भारी
रख के किनारे थोड़ा सुस्ता लूँ

bahut sundar !
pavitr prarthna !!!!

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर भक्तिपूर्ण प्रार्थना...

kshama ने कहा…

Shardaji,aise laga,jaise palbhar mere manka bojh bhee halka ho gaya!