मंगलवार, 24 मई 2011

जमीं खिसकी तो बने फ़कीर

रात और दिन का मेल
कभी संध्या कभी सबेर
बस थोड़े से पल लगते
जिन्दगी के हाथों में बटेर

जमीन और आसमाँ के दरमियाँ
एक पतली सी लकीर
जितने भी सपने बुनो
जमीं खिसकी तो बने फ़कीर

धूप और छाया तकते
कच्ची वय के अबीर
जाने कब सो जाता
राह तकते तकते जमीर

12 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

जमीं खिसकी तो बने फ़कीर
यही तो सच्चाई है लेकिन इन्सान इसको समझने में कभी कभी गलती करता है |

Shah Nawaz ने कहा…

सच्चाई लिखी है... बहुत खूब!

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

'जाने कब सो जाता

राह तकते तकते जमीर '

......................सुन्दर,भावपूर्ण रचना

Kailash C Sharma ने कहा…

जितने भी सपने बुनो
जमीं खिसकी तो बने फ़कीर

....यही तो जीवन की सच्चाई है..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

arqam ने कहा…

mera Bharat hai mhan. karta hun dil se samman.

२५ मई २०११ ४:१७ अपराह्न

arqam ने कहा…

rat ko sojata hun bahtar sapno ki intzar main

kshama ने कहा…

रात और दिन का मेल
कभी संध्या कभी सबेर
बस थोड़े से पल लगते
जिन्दगी के हाथों में बटेर
Behad khoobsoorat rachana!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

रात और दिन का मेल
कभी संध्या कभी सबेर
बस थोड़े से पल लगते
जिन्दगी के हाथों में बटेर...
बहुत सुंदर शब्दों में कही गई बात.

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

जाने कब सो जाता
राह तकते तकते ज़मीर

सच कहा आप ने ज़मीर ही तो सोया हुआ है हमारा
सुंदर रचना

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी (कोई पुरानी या नयी ) प्रस्तुति मंगलवार 14 - 06 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच- ५० ..चर्चामंच

manu ने कहा…

बस थोड़े से पल लगते
जिन्दगी के हाथों में बटेर.

bahut sundar likhaa hai..