मंगलवार, 29 मार्च 2011

कर्म यज्ञ है आहुति जीवन

जात पूछो साधू की
एक ईश के बन्दे

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई
जात पात के रन्दे

राह सँकरी पहुँचे वहीं
धर्म नहीं हैं फन्दे

कर्म यज्ञ है आहुति जीवन
अपने अपने हैं हन्दे

एक नूर से उपजे हैं सब
कौन भले कौन मन्दे

रन्दे=औजार जिनसे तराशा जाता है
हन्दे =उपभोग से पहले ब्रहामण के लिये निकला जाने वाला भाग

5 टिप्‍पणियां:

इमरान अंसारी ने कहा…

सुभानाल्लाह........हैट्स ऑफ इस पोस्ट के लिए.......ऐसे ही सोच की आज इस देश को बहुत ज़रुरत है .......प्रशंसनीय |

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

जात न पूछो साधू की
एक ईश के बन्दे

sach hai ,man ki sachchi bhavanaon ko shabd de diye ap ne

kshama ने कहा…

Harek yug ke liye behtareen aur mauzoom rachana!Wah!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

एक सकारात्मक सोच
और समाज के लिए बड़ा पैग़ाम.

इमरान अंसारी ने कहा…

शारदा जी आपने मेरे ब्लॉग - क़लम का सिपाही पर जो टिप्पणी छोड़ी थी उसमे आपने एक प्रश्न उठाया था.....जो एक जिज्ञासु प्रश्न लगा मुझे.....जो सच्चे ह्रदय से निकला था.....आपका आभार......मेरे ब्लॉग की एक सुधि पाठिका श्रीमती अनीता जी से मैंने अनुरोध किया था कि वो आपकी उस जिज्ञासा का यथोचित उत्तर दे......जिसे उन्होंने अपनी टिप्पणी के माध्यम से मेरे ब्लॉग पर दिया है ......जब भी आपको समय मिले उसे ज़रूर देखें......उम्मीद करता हूँ आपकी जिज्ञासा का समाधान हो जायेगा |