शनिवार, 22 मई 2010

ऐसी होती है दोपहर

आँखों में कटता है पहर
ऐसी होती है दोपहर

जीवन की दुपहरी दम माँगे
नाजुक मोड़ों पर तन्हाई
चुभता सूरज भी ख़म माँगे
खोल ज़रा तू हाले-जिगर
ऐसी होती है दोपहर

प्राण साथी का ही काँधा माँगे
तप कर पिघली है तरुणाई
घिरे बदरा से बरखा माँगे
तपता आसमाँ भी गया है ठहर
ऐसी होती है दोपहर

3 टिप्‍पणियां:

सतीश चंद्र सत्यार्थी ने कहा…

सचमुच दोपहर ऐसी ही होती है...
बहुत सुन्दर....

माधव ने कहा…

NICE POEM

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना