गुरुवार, 6 मई 2010

धुएँ का पहाड़

आदमी कुछ भी नहीं
हसरतों के सिवा
धुएँ का पहाड़
उठता है
क्या जाने किधर से आता है
चिँगारी दिखाने की देर है
लपटों से घिरा नजर आता है
कभी बेड़ियाँ , कभी पायल
और ख़्वाबों की सैर-गाह
कभी गुबार और
लपटों से झुलस जाता है
आदमी कुछ भी नहीं
चिँगारी , गुबार और लपटें
धुएँ का खेल है
आदमी को बीमार कर जाता है

5 टिप्‍पणियां:

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

बहुत ख़ूब...
मन को छू लेने वाली रचना...

SANJEEV RANA ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना धन्यवाद

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

गंभीर सवाल...और बेहद ज़रूरी भी.
बहुत प्रभावी रचना.

दिलीप ने कहा…

bahut khoob mam...