बुधवार, 4 नवंबर 2009

सोने दे मुझे शब भर को

सोने दे मुझे शब भर को
कितनी है कीमत अपनों की
आराम की कीमत कितनी है
आँसू न कर पाये कीमत
उधड़ा है जिगर
सिलाई की कीमत कितनी है
सब्र कितने वक्त का , ये बता
ये सफर है या मुकाम
आड़े वक्त के साथी ,
क्या यही है मेरा ईनाम
सोने दे मुझे शब भर को

4 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

अपने मनोभावों को सुन्दर शब्द दिए हैं बधाई।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा भाव!!

M VERMA ने कहा…

बहुत सुन्दर मनोभाव की कविता

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अद्भुत रचना...बधाई..
नीरज