शुक्रवार, 15 मई 2020

इन्सान बचाओ , इंसानियत बचाओ

बढ़ती जा रही है कोरोना से त्रस्त लोगों की सँख्या
सुन तो रहे हैं
सुन्न भी होते जा रहे हैं
हवाओं में है कोरोना का ज़हर
ज़ेहन में हैं मेरे जाँ-बाज सिपाही
सेना , डॉक्टर ,सफाई कर्मचारी
लगा कर दाँव पर खुद को ही
निकले हैं किसी अभियान पर
शुक्रिया कर रहा है मेरे देश का कण-कण
अम्बर से बरसा रहे सुमन
हम साक्षी हैं इस क्षण के भी

मेरे देश का इक इक नागरिक लड़ रहा है लम्बी लड़ाई
खतरे में है वजूद
अदृश्य है दुश्मन
बचा रहे इन्सान का नामों-निशाँ

आओ सब एक साथ
भूल कर सारे भेद , बैर-भरम
सिर्फ हौसले की जंग काफी नहीं
जुनूने-जोश की भाषा समझता है दिल
प्रेरणा ही वो शय है जो जीत का सबब बनती है
जीतेंगे हम , मनुष्य की लड़ाई है मनुष्यता के लिए
इन्सान बचाओ , इंसानियत बचाओ
Save humans , Save humanity


सोमवार, 27 अप्रैल 2020

परिन्दगी के लिए


हौसले की जँग ज़िन्दगी के लिए
ऐ ज़िन्दगी बता , और क्या चाहिए बन्दगी के लिए
हर शर्त सर-माथे पर
ज़िन्दगी की , ज़िन्दगी के लिए

लबों पे हो मुस्कराहट
काबू में हो धड़कन की सुर-ताल
बजा ले मुझको ऐ ज़िन्दगी ,
और क्या चाहिए साजिन्दगी के लिए

धूप-छाया की कहानियों में उलझे तेरे किरदार
तेरे आँचल की है बस दरकार
सुकून दे मुझको ऐ ज़िन्दगी
और क्या चाहिए ताज़िन्दगी के लिए

दूर-दूर बैठे भी हम सब हैं साथ
इक डाल पर बैठे परिन्दों की तरह
पँख हैं तो है परवाज भी हासिल
और क्या चाहिए परिन्दगी के लिए 

रविवार, 5 अप्रैल 2020

दिया

दिया है प्रकाश का नाम 
जिसके आगे अन्धकार हारा है 
मन की बाती और संकल्पों का तेल 
और फिर देखो दिव्यता का खेल 
सम्पूर्ण विश्व साथ हो 
सर पर माँ भारती का हाथ हो 
मँगल की है कामना 
माँगल्य का ही वास हो 
सँताप न व्यापे कभी 
और दिव्यता का साथ हो 

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

सवालों के घेरे में इन्सानियत

क्या कहें अब मूक ज़ुबानें 
सुलगती चिंगारियाँ और फुंके घर-बार दुकानें 
कुर्बान हो गईं कितनी ज़िन्दगियाँ 
नफरत की जलती मिसालें 

अब नहीं बनना है कहानियाँ हमको 
नहीं झेलने हैं और बँटवारे के दर्द 
सदियों को झेलना पड़ता है 
ढोतीं हैं पीढ़ियाँ बोझा 
खोल के देख ले तू ज़हन की किताबें 

पहले आप , पहले आप वाले देश में 
मैं ही मैं , मैं ही मैं कैसे हुई 
अपनों में कौन बेगाना है 
कोई तो पूछ बताये हमें 
सवालों के घेरे में इन्सानियत 
सोये ज़मीर को जगाओ तो जानें 

बुधवार, 8 जनवरी 2020

बड़ा मुबारक

वो भी डोलती होगी किसी के अँगने में 
होगी वो भी किसी की जाँ ,
झूलती होगी ममता के पलने में 

प्यार उमड़ता है मुस्करा उठते हैं 

अहसास उठते हैं रह-रह के सीने में 
सींचता है कोई माली हर फूल को 
आबाद रहे हर फूल की दुनिया 
गुलशन के कोने-कोने में 

बड़ा मुबारक है आज का दिन 

सूरज जो चढ़ा खिड़-खिड़ करता 
कितने सारे चाँद उगे हैं ,
महफ़िल के अफ़साने में 

मेरी दुआओं का असर है शायद 

हसीन से सपनों में कोई रँग भरता 
तुम छम-छम करती आ जाओ 
कैद कर लेंगे तुम्हें सफर सुहाने में 

सोमवार, 16 सितंबर 2019

मॉं का दिल

हाथों से फिसलती हुई दुनिया थी
और क़दमों में दम था ही नहीं
अपने ही जिगर के टुकड़ों को ,
जब देखते हैं हम मुश्किल में
तारे टूटें , धरती धँसती , आँखों में समँदर ठहरा सा
और कहर की रात है क्या

उठती-गिरती साँसें थीं

और ज़िन्दगी रुठी थी
एक न्यामत होती है ज़िन्दगी
टँग जाएँ हम उल्टे भी
इस दुनिया की खातिर ही , तो भी गम ही नहीं
जिसके सहारे निश्चिन्त थे हम
वो ही धरती डोल गई
और कहर की रात है क्या

सूरज हो तुम ,चँदा हो तुम

मेरी आँखों के तारे हो तुम
मेरी रातों के उजियारे हो तुम
कलाई पर दूर बैठी बहनों के नाम की पहनी हुई राखियों को ,
देवी माँ के बँधे हुए रक्षा कलावे को उतरवा कर
ओढ़ कर माँ पापा की दुआओं का आसमान ,
प्रेयसि की धड़कनों का ताज,
इष्ट-मित्रों  ,अज़ीज़ों की दुआओं के साथ
जा रहे थे तुम ओ.टी. की तरफ 
कड़वी दवाई पिलाई है ज़िन्दगी ने घूँट-घूँट कर के 
रुलाइयाँ अटक गईं हैं हलक में 
तेरी सलामती के लिए मैं दुनिया की सारी न्यामतें वार दूँ 
उठो संभालो मेरी दुनिया तुमसे 
जब-जब तू मुस्कराये , मेरी दुनिया खिल-खिल जाये 
लम्हा-लम्हा गाये , तू ज़िन्दगी को गले लगाये 
मेरे लिये इस से बढ़ कर और सहर की बात है क्या 

रविवार, 21 जुलाई 2019

जीवन की वेदी पे सब कुछ हवन है

साथ-साथ वक्त बिताना, मिलना-मिलाना अच्छा लगता है 
दुनिया के रँगों में रँग-रँग जाना अच्छा लगता है 

धीरे से जानोगे , धीरे से समझोगे 
बिना मक्सद के कोई किसी से नहीं है मिलता 
धीरे-धीरे खुलेगी कलई रिश्तों की , दोस्तों की 
गरज हो तो सिर पे बिठायेगी दुनिया 
ज़र्रे-ज़र्रे में जमीं पे गिराना ,
दुनिया को अच्छा लगता है 

मन ही है मिट्ठू , मन ही है बौना 
मन ही है ख्वाहिशों की चादर , अपना बिछौना 
मन ही है मिट्टी , मन ही है सोना 
इक अंधी दौड़ का राही है ये 
कैसे बतायें खोना न खोना 
इक नँगा सच है जिस्म लपेटे 
मन ही है अद्धा-पव्वा , मन ही है सागर सलोना 
मन के रँगों में रँग-रँग जाना अच्छा लगता है 

मन को सँभालो , दुनिया है मुट्ठी में 
कोई देखे न देखे , जाने न जाने 
तेरा सब्र ही है तेरी मस्ती 
दुनिया की भीड़ से अलग तेरी बस्ती 
आया कोई तो गले से लगा लो 
न आया तो रंज नहीं है 
राहों से अपना कोई गिला न 
जीवन की वेदी पे सब कुछ हवन है 
जीवन ही मुस्कराये , चमन में खुशबू-खुशबू होना ,
अच्छा लगता है