गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

चिरनिद्रा में सो गये तुम

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विशाल , जिसे मैंने बच्चे से बड़े होते हुये देखा , आज उसी को श्रद्धाँजलि दे रही हूँ। उसके भोलेपन और सादगी को मैं बार-बार प्रणाम करती  हूँ।

चिरनिद्रा में सो गये तुम
माँ का दिल ये कैसे माने
तुम्हारी जैकेट , तुम्हारी दवा की खुली शीशी
तुम्हारे बिस्तर पर पड़ी सलवटों से
अभी अभी तुम्हारे उठ कर जाने का अहसास
अभी तो तुम्हारे बोल भी सुनाई देते हैं
पापा की बुझी-बुझी नजरें , बहना का रोता हुआ दिल , पूछ रहा है
भला ऐसे भी कोई जाता है दुनिया से , बेवक्त , बेवजह
इन्सान चला जाता है , पर क्या अहसास कभी मरते हैं 

ज़िन्दगी इतनी नश्वर है के ,
बिखरे तो समेटी ही नहीं जाती 
यूँ तो जा रहे हैं हम सभी ,
काल के मुँह में , एक एक दिन , लम्हा-लम्हा 
यूँ मुँह मोड़ कर चले गये तुम , कोई कुछ कर न पाया 
चाचा बुआ , हम सबके अजीज , माँ-पापा के दुलारे 
तुम्हारी सादगी , तुम्हारा भोला मुखड़ा ,
यादों से सँभाला न जायेगा 
तुम जहाँ भी रहो , महफूज़ रहो 
परम-पिता की गोदी में तुम्हें सौंप कर 
छलकती आँखों ने तुम्हें विदाई दी है , विदाई दी है। 

2 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह मार्मिक अभिव्यक्ति कल शुक्रवार (19.02.2016) को "सफर रुक सकता नहीं " (चर्चा अंक-2257)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

शारदा अरोरा ने कहा…

dhanyvaad rajendra ji ...