रविवार, 13 दिसंबर 2015

क्या-क्या लिक्खा

देखूँ तो जरा ,
मेरे क़दमों में तूने है क्या-क्या रक्खा 
मेरी पेशानी पे है क्या-क्या लिक्खा 

ऐ लेखनी तेरे क़दमों की धूल बनूँ 
लो फिर मैंने कोई तमन्ना कर ली 
वक़्त मिटा डाले चाहे जितना 
दिल है के कोई सहारा माँगे 

कहते हैं के तकदीर नहीं बदल सकता कोई 
फिर ये जद्दो-जहद किस के लिए 
रँग की दुनिया का कहर किस के लिए 
फिर जो होना है तो होता रहे , झेल ले जिगर के साथ 

ज़िन्दगी एक रवानी के सिवा कुछ भी नहीं 
सिर्फ कोशिश भर नहीं है ज़िन्दगी 
कौन जाने किसके पसीने ने वक़्त के सीने पर है क्या-क्या लिक्खा 

4 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

ज़िन्दगी एक रवानी के सिवा कुछ भी नहीं
सिर्फ कोशिश भर नहीं है ज़िन्दगी
कौन जाने किसके पसीने ने वक़्त के सीने पर है क्या-क्या लिक्खा
.. सच जिंदगी में कब क्या हो जाय कोई नहीं जानता। . जिंदगी को कोई नहीं समझ पाया है
..बहुत सुन्दर

अजय कुमार झा ने कहा…

वाह बहुत ही कमाल का है आपने लिखा ...सुन्दर भाव |

Rahul... ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा आपने शारदाजी..

Anil Sahu ने कहा…

बहुत ही बढ़िया रचना.