बुधवार, 19 नवंबर 2014

अपना क़र्ज़ आप है भरना

बड़ी तपस्या पर निकले हो 
लेश मात्र भी रोष न करना 
अपने हिस्से की छाया पर 
सब्र और सन्तोष तुम करना 

सुख की दौड़ , मन भरमाती है 
दुख के तराजू पे खरे उतरना 
छूटती साँसें , डूबती उम्मीद 
कोई तो अलख जगा के रखना 

होता है कोई तो रिश्ता
दर्द की जुबाँ को तुम समझना 
अपना-अपना जोग यही है 
काँटों पर चल ,है पार उतरना 

आहुति माँगे ,अक्सर ज़िन्दगी 
रो-के हँस के , हवन है करना 
गुजरा हद से दर्द भी देखो 
अपना क़र्ज़ आप है भरना 

1 टिप्पणी:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (21.11.2014) को "इंसान का विश्वास " (चर्चा अंक-1804)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।