सोमवार, 10 नवंबर 2014

एक खता पर ज़िन्दगी वारी

खता बस एक ही की 
तुझे अपना माना 
तेरे घर को अपना घर जाना 

दिल के हाथों हैं मजबूर 
तेरे बगैर न ज़िन्दगी ही बचती है 
न ज़िन्दगी के मायने ही 
अपनी दुनिया बड़ी नहीं है 
दिल अपना तो बहुत बड़ा है 
छोटी-छोटी बातों पे अड़ा है 

चलने को कदम भी बहानें माँगें 
कितने बरस सजाये मैंने 
उम्मीद के दिये जलाये मैंने 
एक खता पर ज़िन्दगी वारी 
उम्र का इक-इक लम्हा वारा 
धुआँ-धुआँ हैं राहें मेरी 
तुझको मुबारक दुनिया सारी 
लब सी लेंगे ,घुट जाएँगे 
बेगाने घर न जी पायेँगे 
न जी पायेँगे 
खता बस एक ही की


 

2 टिप्‍पणियां:

aprna tripathi ने कहा…

bahut sundar

संजय भास्‍कर ने कहा…

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।